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प्रादेशिकीउत्तर-प्रदेश Alert Star Digital Team Sep 19, 2023 09:49 PM

27 साल से क्यों लटका है महिला आरक्षण बिल, क्या दूर हो गईं अड़चनें? छोटे दलों का फोकस क्या

27 साल से क्यों लटका है महिला आरक्षण बिल, क्या दूर हो गईं अड़चनें? छोटे दलों का फोकस क्या

27 साल से क्यों लटका है महिला आरक्षण बिल, क्या दूर हो गईं अड़चनें? छोटे दलों का फोकस क्या

केंद्रीय कैबिनेट ने सोमवार की शाम महिला आरक्षण बिल को मंजूरी दे दी है। अब यह बिल संसद के पांच दिवसीय विशेष सत्र में पेश किया जाना है। यह बिल करीब 27 वर्षों से लंबित है।

आंकड़ों से पता चलता है कि लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या 15 प्रतिशत से कम है, जबकि कई राज्य विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व 10 प्रतिशत से भी कम है। महिला आरक्षण बिल के पारित होने से यह प्रतिनिधित्व बढ़ जाएगा।

महिला आरक्षण बिल को संसद से पारित कराने के लिए आखिरी बार ठोस प्रयास यूपीए सरकार में साल 2010 में हुआ था, जब राज्यसभा ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने के कदम का विरोध करने वाले कुछ सांसदों को मार्शलों द्वारा बाहर निकाले जाने के बीच विधेयक पारित कर दिया था, लेकिन लोकसभा में जाकर यह विधेयक लटक गया। निचले सदन ने इसे पारित नहीं किया।

कांग्रेस-बीजेपी बिल की हमेशा पक्षधर
बड़े दलों खासकर बीजेपी और कांग्रेस ने हमेशा इस विधेयक का समर्थन किया है, जबकि अन्य छोटे दल इसका विरोध इस मांग के साथ करते रहे हैं कि महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण के भीतर भी पिछड़े वर्गों का महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था की जाए। फिलहाल, लोकसभा में 78 महिला सांसद हैं, जो कुल संख्या 543 का 15 प्रतिशत से भी कम है। सरकार द्वारा पिछले दिसंबर में संसद के साथ साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, राज्यसभा में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगभग 14 फीसदी है।

जानिए राज्यों का हाल
आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, गोवा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, ओडिशा, सिक्किम, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा और पुडुचेरी सहित कई राज्य विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 10 प्रतिशत से कम है। दिसंबर 2022 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बिहार, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में 10-12 फीसदी ही महिला विधायक थीं। छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और झारखंड में यह आंकड़ा क्रमश: 14.44 प्रतिशत, 13.7 प्रतिशत और 12.35 प्रतिशत है। इन्हीं आंकड़ों के साथ ये राज्य चार्ट में सबसे आगे हैं।

पिछले कुछ हफ्तों में, बीजद और बीआरएस सहित कई दलों ने विधेयक को फिर से पेश करने की मांग की है, जबकि कांग्रेस ने भी रविवार को अपनी हैदराबाद कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में इस पर एक प्रस्ताव पारित किया।

कितना फीसदी आरक्षण का प्रस्ताव
हालांकि, अभी तक यह नहीं पता चल सका है कि नए विधेयक में महिलाओं के लिए कितने प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव किया जा रहा है और उसमें भी ओबीसी कैटगरी की महिलाओं के लिए अलग से कोटा निर्धारित किया गया है या नहीं। बता दें कि 2008 के बिल में, जिसे लोकसभा के विघटन से पहले 2010 में राज्यसभा में पारित किया गया था, लोकसभा और विधानसभा की सभी सीटों में से एक तिहाई सीट महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रस्ताव किया गया था। महिला आरक्षण बिल को पास कराने की आखिरी कोशिश मनमोहन सिंह की सरकार में हुई थी।

2010 के बिल में क्या था प्रस्ताव
पीआरएस लेजिस्लेटिव पर उपलब्ध एक लेख के अनुसार, उस बिल में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और एंग्लो-इंडियन के लिए कोटा-के भीतर कोटा का प्रस्ताव रखा गया था। इसके अलावा आरक्षित सीटों को प्रत्येक आम चुनाव के बाद रोटेट किया जाना था। इसका मतलब था कि तीन चुनावों के चक्र के बाद, सभी निर्वाचन क्षेत्र एक बार महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगे। उस प्रस्ताव के मुताबिक, आरक्षण 15 वर्षों के लिए लागू होना था।

महिला आरक्षण बिल का इतिहास
यूपीए शासनकाल में साल 2008 और 2010 के असफल प्रयास से पहले भी इस मुद्दे का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है क्योंकि इसी तरह का बिल 1996, 1998 और 1999 में पेश किया गया था। गीता मुखर्जी की अध्यक्षता में एक संयुक्त संसदीय समिति ने 1996 के विधेयक की जांच की थी और सात सिफारिशें की थीं। इनमें से पांच को 2008 के विधेयक में शामिल किया गया था, जिसमें एंग्लो इंडियंस के लिए 15 साल की आरक्षण अवधि और उप-आरक्षण शामिल था।

गीता मुखर्जी समिति की दो सिफारिशें शामिल नहीं
इनमें ऐसे मामलों में आरक्षण भी शामिल है, जहां किसी राज्य में लोकसभा की तीन से कम सीटें हैं (या एससी/एसटी के लिए तीन से कम सीटें); दिल्ली विधानसभा के लिए भी आरक्षण की सिफारिश की गई थी; और "एक-तिहाई से कम नहीं" को "जितना संभव हो सके, एक-तिहाई" सीट में बदलने की सिफारिश रखी गई थी। समिति की दो सिफ़ारिशों को 2008 के विधेयक में शामिल नहीं किया गया था; पहला राज्यसभा और विधान परिषदों में सीटें आरक्षित करना और दूसरा ओबीसी महिलाओं के लिए उप-आरक्षण की व्यवस्था करना।

सपा, राजद और जदयू के किया था कड़ा विरोध
2008 के विधेयक का सपा, राजद और जद (यू) ने कड़ा विरोध किया था। इन दलों ने बिल में ओबीसी महिलाओं के लिए भी क्षैतिज आरक्षण की मांग की थी। संसद में हंगामे को देखते हुए 2008 के विधेयक को संसद की कानून और न्याय संबंधी स्थायी समिति (Standing Committee on Law and Justice,) को भेजा गया था, लेकिन समिति आम सहमति तक पहुंचने में विफल रही।

ओबीसी महिलाओं को आरक्षण के मुद्दे पर समिति ने कहा कि "विधेयक के पारित होने के मौजूदा समय में अन्य सभी मुद्दों पर सरकार बिना किसी देरी के उचित समय पर विचार कर सकती है।" बता दें कि महिला आरक्षण विधेयक पारित कराने के लिए सरकार को संसद के प्रत्येक सदन में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी।

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