होम यूपी एनकाउंटर पर फिर छिड़ी बहस! गाजीपुर मुठभेड़ के बाद सामने आया जातीय और धार्मिक आंकड़ों का मुद्दा
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में विनीत राय हत्याकांड के आरोपी कमलेश के एनकाउंटर के बाद राज्य में एक बार फिर पुलिस मुठभेड़ों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में विनीत राय हत्याकांड के आरोपी कमलेश के एनकाउंटर के बाद राज्य में एक बार फिर पुलिस मुठभेड़ों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। विपक्ष जहां एनकाउंटर की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए इसे जाति और धर्म के नजरिए से देख रहा है, वहीं राज्य सरकार इसे अपराध और माफिया के खिलाफ अपनी ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का हिस्सा बता रही है।
गाजीपुर एनकाउंटर के बाद न केवल विपक्षी दलों ने सरकार को घेरा है, बल्कि मामले में मृतक के परिजनों की ओर से भी पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इसी बीच उत्तर प्रदेश में पिछले वर्षों के एनकाउंटर से जुड़े आंकड़े भी चर्चा का विषय बन गए हैं।
विनीत राय हत्याकांड के मुख्य आरोपी बताए जा रहे कमलेश की पुलिस मुठभेड़ में मौत के बाद प्रदेश की राजनीति गर्मा गई है। विपक्षी दलों का आरोप है कि एनकाउंटर की कार्रवाई में निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े होते हैं, जबकि सरकार का कहना है कि अपराधियों के खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई की जा रही है।
गाजीपुर की घटना ने एक बार फिर पुलिस मुठभेड़ों और उनकी प्रक्रिया को लेकर सार्वजनिक बहस को हवा दे दी है।
मुख्यमंत्री Yogi Adityanath के कार्यकाल में कई हाई-प्रोफाइल पुलिस मुठभेड़ें सुर्खियों में रही हैं।
इनमें जुलाई 2020 में कानपुर कांड के आरोपी Vikas Dubey का एनकाउंटर, बाराबंकी में टिंकू कपाला की मुठभेड़, लखनऊ में हमजा का एनकाउंटर, झांसी में Asad Ahmed की मौत तथा मेरठ में Anil Dujana का एनकाउंटर प्रमुख मामलों में शामिल हैं।
इन घटनाओं को लेकर समय-समय पर राजनीतिक और कानूनी बहस भी होती रही है।
सरकारी पक्ष का तर्क है कि सख्त कानून-व्यवस्था और अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई का असर अपराध के आंकड़ों में दिखाई देता है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2017 की तुलना में 2024 में हत्या, अपहरण, फिरौती, बलात्कार, चोरी और डकैती जैसे अपराधों के मामलों में कमी दर्ज की गई है। सरकार इसे अपनी कानून-व्यवस्था नीति की सफलता के रूप में पेश करती है।
मार्च 2017 से मई 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, मेरठ जोन में सबसे अधिक पुलिस मुठभेड़ें दर्ज की गईं। इसके बाद आगरा और वाराणसी जोन का स्थान रहा।
आंकड़ों के मुताबिक इन जोनों में बड़ी संख्या में अपराधियों की गिरफ्तारी हुई, जबकि कई मामलों में आरोपी घायल हुए और कुछ मुठभेड़ों में मौतें भी दर्ज की गईं।
मीडिया रिपोर्टों में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, 31 मार्च 2017 से 5 सितंबर 2024 के बीच पुलिस मुठभेड़ों में कुल 207 अपराधियों की मौत हुई थी।
इन आंकड़ों में विभिन्न जातीय और धार्मिक समुदायों से जुड़े लोगों का उल्लेख किया गया है। विपक्ष इन आंकड़ों के आधार पर सवाल उठा रहा है और मुठभेड़ों की निष्पक्षता पर चर्चा कर रहा है। वहीं सरकार का कहना है कि पुलिस कार्रवाई किसी जाति, धर्म या समुदाय को देखकर नहीं, बल्कि अपराध और आपराधिक रिकॉर्ड के आधार पर की जाती है।
राज्य सरकार का दावा है कि अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई का एकमात्र आधार कानून और अपराध की गंभीरता है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार सार्वजनिक मंचों से अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की बात करते रहे हैं। उनकी सरकार ने कानून-व्यवस्था को अपनी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल किया है।
सरकार का कहना है कि माफियाओं, गैंगस्टरों और संगठित अपराध से जुड़े तत्वों पर लगातार कार्रवाई की जा रही है। इसके तहत गैंगस्टर एक्ट, संपत्ति जब्ती, बुलडोजर कार्रवाई और विशेष पुलिस अभियानों का सहारा लिया गया है।
उत्तर प्रदेश में पुलिस मुठभेड़ों का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक बहस का हिस्सा रहा है। एक पक्ष इसे अपराध नियंत्रण का प्रभावी तरीका मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसकी पारदर्शिता और प्रक्रिया पर सवाल उठाता है।
गाजीपुर एनकाउंटर के बाद यह बहस एक बार फिर तेज हो गई है और आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और बढ़ने की संभावना है।
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