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समाचारराजनीतिप्रादेशिकीउत्तर-प्रदेश Alert Star Digital Team Jun 7, 2026 06:01 PM

UP Election 2027: पूर्वांचल की 125 सीटें बनेंगी सत्ता की चाबी! क्या वाराणसी से फिर लिखी जाएगी लखनऊ की कहानी?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की राजनीतिक सरगर्मियां अभी से तेज होने लगी हैं। चुनाव में सबसे ज्यादा नजरें पूर्वांचल पर टिकी हैं, क्योंकि राज्य की सत्ता तक पहुंचने का रास्ता लंबे समय से इसी क्षेत्र से होकर गुजरता रहा है।

UP Election 2027: पूर्वांचल की 125 सीटें बनेंगी सत्ता की चाबी! क्या वाराणसी से फिर लिखी जाएगी लखनऊ की कहानी?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की राजनीतिक सरगर्मियां अभी से तेज होने लगी हैं। चुनाव में सबसे ज्यादा नजरें पूर्वांचल पर टिकी हैं, क्योंकि राज्य की सत्ता तक पहुंचने का रास्ता लंबे समय से इसी क्षेत्र से होकर गुजरता रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कोई दल पूर्वांचल में मजबूत प्रदर्शन करता है, तो उसके लिए लखनऊ की सत्ता का रास्ता काफी आसान हो जाता है। खास बात यह है कि इस पूरे क्षेत्र का राजनीतिक केंद्र वाराणसी को माना जा रहा है, जहां से चुनावी रणनीतियों की नींव रखी जा रही है।

क्यों अहम हैं पूर्वांचल की 125 विधानसभा सीटें?

पूर्वांचल उत्तर प्रदेश की राजनीति का सबसे प्रभावशाली क्षेत्र माना जाता है। इस इलाके में वाराणसी, चंदौली, जौनपुर, आजमगढ़, भदोही, गाजीपुर, मऊ, मिर्जापुर और संतकबीर नगर समेत करीब 25 जिले शामिल हैं। इन जिलों में कुल 125 विधानसभा सीटें आती हैं, जो किसी भी दल के लिए बहुमत का गणित बदलने की क्षमता रखती हैं।

इन सीटों पर हमेशा से राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिलती रही है। कई बार पूर्वांचल के नतीजों ने पूरे प्रदेश की राजनीतिक तस्वीर बदल दी है।

2017 और 2022 में भी दिखा था पूर्वांचल का असर

बीते दो विधानसभा चुनावों में एनडीए ने उत्तर प्रदेश में स्पष्ट बहुमत हासिल कर सरकार बनाई थी। हालांकि पूर्वांचल की कई सीटों पर समाजवादी पार्टी ने भाजपा को कड़ी चुनौती दी थी।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2027 का मुकाबला और भी दिलचस्प हो सकता है, क्योंकि इस बार कई सीटों पर स्थानीय उम्मीदवारों की लोकप्रियता और जमीनी पकड़ बड़ा फैक्टर साबित हो सकती है। सिर्फ बड़े चेहरे या पार्टी का चुनाव चिन्ह ही परिणाम तय नहीं करेगा।

कई दलों के लिए निर्णायक होगा पूर्वांचल

पूर्वांचल में भाजपा, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के अलावा कई क्षेत्रीय दल भी सक्रिय हैं। इनमें सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP), अपना दल और निषाद पार्टी जैसे दल शामिल हैं।

इन पार्टियों का प्रभाव कई सीटों पर चुनावी समीकरण बदल सकता है। यही वजह है कि सभी प्रमुख राजनीतिक दल अभी से इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।

वाराणसी क्यों बना हुआ है राजनीतिक केंद्र?

पूर्वांचल की राजनीति में वाराणसी की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है। यही कारण है कि चुनाव नजदीक आते ही विभिन्न दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की गतिविधियां यहां बढ़ने लगी हैं।

पार्टी बैठकों, जनसंपर्क अभियानों और संगठनात्मक कार्यक्रमों का केंद्र वाराणसी बनता जा रहा है। राजनीतिक दल इस क्षेत्र को साधकर पूरे पूर्वांचल में प्रभाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

2014 के बाद बनारस से बदली थी पूर्वांचल की राजनीति

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद पूर्वांचल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला। इसके बाद 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में भी वाराणसी को चुनावी रणनीति का केंद्र बनाया गया।

चुनाव के अंतिम चरणों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी और आसपास के क्षेत्रों में लगातार रैलियां और रोड शो किए थे। माना जाता है कि इसका असर न केवल वाराणसी की विधानसभा सीटों पर पड़ा, बल्कि पूरे पूर्वांचल के कई जिलों में एनडीए को राजनीतिक बढ़त मिली।

2027 में प्रतिष्ठा की लड़ाई बनेगा पूर्वांचल

इस बार पूर्वांचल सिर्फ चुनावी मुकाबले का क्षेत्र नहीं बल्कि कई राजनीतिक दलों और नेताओं की प्रतिष्ठा का सवाल भी बन गया है। भाजपा के लिए जहां अपने मजबूत गढ़ को बरकरार रखना चुनौती होगी, वहीं विपक्षी दल इस क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर सत्ता समीकरण बदलने की कोशिश करेंगे।

मतदाताओं का रुख क्या होगा, इसका फैसला तो चुनाव के बाद ही होगा, लेकिन इतना तय है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में पूर्वांचल और खासकर वाराणसी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रहने वाली है।

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