होम यूपी में 100 सीटों पर खतरा? पंकज चौधरी की ताजपोशी के बाद एकजुट हुए ब्राह्मण विधायक, लिट्टी-चोखा पर पकी सियासत
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में चल रहे विधानसभा के शीतकालीन सत्र के बीच एक दावत ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। रविवार (22 दिसंबर) की शाम कुशीनगर से भाजपा विधायक पंचानंद पाठक के आवास पर ब्राह्मण विधायकों का एक बड़ा जमावड़ा लगा।
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में चल रहे विधानसभा के शीतकालीन सत्र के बीच एक 'दावत' ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। रविवार (22 दिसंबर) की शाम कुशीनगर से भाजपा विधायक पंचानंद पाठक के आवास पर ब्राह्मण विधायकों का एक बड़ा जमावड़ा लगा। आधिकारिक तौर पर इसे विधायक की पत्नी के जन्मदिन और सह-भोज का कार्यक्रम बताया गया, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे महज एक दावत नहीं मान रहे हैं। दरअसल, हाल ही में कुर्मी समाज से आने वाले पंकज चौधरी को यूपी बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है और उससे पहले ठाकुर विधायकों की एक बैठक भी हो चुकी है। ऐसे में ब्राह्मण विधायकों की इस जुटान को शक्ति प्रदर्शन और समाज की 'नाराजगी' से जोड़कर देखा जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक में करीब 45 से 50 विधायक और एमएलसी शामिल हुए, जिसमें सत्ताधारी दल के अलावा अन्य दलों के ब्राह्मण चेहरे भी नजर आए। इस पूरी कवायद में मिर्जापुर के विधायक रत्नाकर मिश्रा और एमएलसी उमेश द्विवेदी की भूमिका अहम मानी जा रही है। बैठक में नृपेन्द्र मिश्रा के बेटे और एमएलसी साकेत मिश्रा की मौजूदगी ने चर्चाओं को और बल दिया। खाने में लिट्टी-चोखा और मंगलवार के व्रत का फलाहार परोसा गया, लेकिन चर्चा का मुख्य विषय यूपी की बदलती जातीय राजनीति रही। गौरतलब है कि यूपी विधानसभा में कुल 52 ब्राह्मण विधायक हैं, जिनमें से 46 अकेले भाजपा से हैं।
भाजपा के लिए ब्राह्मणों की नाराजगी किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। आंकड़ों पर नजर डालें तो प्रदेश में ब्राह्मण मतदाता करीब 8 से 10 फीसदी हैं, लेकिन उनका प्रभाव 110 से अधिक विधानसभा सीटों पर निर्णायक है। प्रदेश के करीब 12 जिले—जैसे गोरखपुर, वाराणसी, प्रयागराज, कानपुर, बस्ती, और अमेठी—ऐसे हैं जहां ब्राह्मण आबादी 15% से ज्यादा है। सीएसडीएस (CSDS) लोकनीति के आंकड़े बताते हैं कि 2017 में भाजपा को 83% और 2022 में 89% ब्राह्मण वोट मिले थे। ऐसे में अगर यह 'लॉयल वोटर' छिटकता है, तो 2027 में भाजपा का समीकरण बिगड़ सकता है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पंकज चौधरी की नियुक्ति के बाद ब्राह्मण समाज को अपना राजनीतिक दबदबा कम होने का डर सता रहा है। हालांकि, बैठक के बाद विधायकों ने इसे राजनीतिक रंग देने से इनकार किया। बैठक में शामिल विधायकों का दावा है कि "इसका उद्देश्य किसी नाराजगी को जाहिर करना नहीं, बल्कि पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव और सामाजिक विषयों पर चर्चा करना था." भले ही विधायक कुछ भी कहें, लेकिन यह तय माना जा रहा है कि यह जुटान 2027 के चुनाव से पहले अपनी हिस्सेदारी और अहमियत जताने की एक कोशिश है।
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