होम 40 साल तक लंबित रही हत्या के मामले की अपील, दोषी की दलील सुन सुप्रीम कोर्ट भी चौंका, बोला- पूरी जिंदगी सजा के साए में बीती
इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर गंभीर चिंता व्यक्त की है। शीर्ष अदालत उस समय हैरान रह गई जब उसके सामने यह तथ्य आया कि हत्या के एक दोषी की अपील पर फैसला आने में करीब चार दशक लग गए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर गंभीर चिंता व्यक्त की है। शीर्ष अदालत उस समय हैरान रह गई जब उसके सामने यह तथ्य आया कि हत्या के एक दोषी की अपील पर फैसला आने में करीब चार दशक लग गए। आरोपी ने वर्ष 1985 में अपनी सजा को चुनौती दी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने उसकी अपील फरवरी 2026 में खारिज की।
मामला विजय सिंह का है, जिन्हें नवंबर 1983 में अपने भाई की गोली मारकर हत्या करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उस समय उनकी उम्र 28 वर्ष थी। बाद में कानपुर की सेशन कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराते हुए दिसंबर 1985 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
सजा के खिलाफ विजय सिंह ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील दायर की, लेकिन यह अपील लगभग 40 वर्षों तक लंबित रही। आखिरकार फरवरी 2026 में हाईकोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि विजय सिंह केवल तीन महीने तक हिरासत में रहे थे। इसके बाद उन्हें जमानत मिल गई और वह करीब 43 वर्षों तक जमानत पर रहते हुए अपनी अपील के अंतिम फैसले का इंतजार करते रहे।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने समक्ष मामला लंबित रहने तक उनकी जमानत जारी रखने का निर्णय लिया। अदालत ने यह भी माना कि इतनी लंबी न्यायिक देरी अपने आप में गंभीर चिंता का विषय है।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने 8 जून 2026 को सुनवाई के दौरान कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में मामलों के निपटारे में हो रही अत्यधिक देरी चिंताजनक है। पीठ ने सवाल उठाया कि लंबित मामलों की बढ़ती संख्या से निपटने के लिए कौन से प्रभावी उपाय अपनाए जा सकते हैं, क्योंकि ऐसी स्थिति न्याय व्यवस्था की कार्यकुशलता को प्रभावित करती है।
अदालत ने यह भी कहा कि लंबित मामलों के कारण कई याचिकाकर्ताओं को शीघ्र सुनवाई की मांग लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ता है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा ने वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे और जोहेब हुसैन से पुराने मामलों के शीघ्र निपटारे को लेकर सुझाव मांगे।
इस दौरान सिद्धार्थ दवे ने सुझाव दिया कि तीन दशक से अधिक समय से लंबित अभियोजन अपीलों को खारिज कर लंबित मामलों का बोझ कम किया जा सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस सुझाव को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल लंबे समय तक लंबित रहने के आधार पर किसी मामले को खारिज करना न्यायिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। पीठ ने कहा कि ऐसा कदम जनहित को नुकसान पहुंचा सकता है और संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने के अवसर से वंचित कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपनी अपील में विजय सिंह ने न्यायिक देरी के कारण हुए मानसिक और सामाजिक प्रभावों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि अब उनकी उम्र 72 वर्ष हो चुकी है और उन्होंने जीवन के लगभग सभी महत्वपूर्ण चरण एक दोषसिद्ध व्यक्ति के रूप में बिताए हैं।
याचिका में कहा गया है, 'चार दशकों से अधिक समय से, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और अब वृद्धावस्था के दौरान वह दोषसिद्धि के साए में जी रहे हैं.'
यह मामला एक बार फिर देश की अदालतों में लंबित मामलों की गंभीर समस्या और न्याय मिलने में होने वाली अत्यधिक देरी को लेकर बहस का विषय बन गया है।
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