होम Israel-Iran War: सत्ता परिवर्तन नहीं, असली निशाना तेल, ईरान पर हमले को लेकर ट्रंप का बड़ा खुलासा
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच ईरान पर अमेरिकी हमले को लेकर एक बड़ा खुलासा सामने आया है। लंबे समय तक इस कार्रवाई को शांति स्थापित करने और परमाणु हथियारों को रोकने की रणनीति बताया जाता रहा, लेकिन अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान ने पूरी कहानी को नई दिशा दे दी है।
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच ईरान पर अमेरिकी हमले को लेकर एक बड़ा खुलासा सामने आया है। लंबे समय तक इस कार्रवाई को शांति स्थापित करने और परमाणु हथियारों को रोकने की रणनीति बताया जाता रहा, लेकिन अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान ने पूरी कहानी को नई दिशा दे दी है। हालिया घटनाक्रम के बाद यह दावा किया जा रहा है कि ईरान पर हमले के पीछे असली मकसद कुछ और ही था।
28 फरवरी को अमेरिका ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला किया था। उस समय दो प्रमुख कारण बताए गए थे। पहला, ईरान में शांति स्थापित करने के लिए सत्ता परिवर्तन की जरूरत, और दूसरा ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना। हालांकि, करीब एक महीने तक चले संघर्ष के बाद ट्रंप के बयान से संकेत मिला कि इन दोनों वजहों के अलावा भी एक बड़ा रणनीतिक लक्ष्य मौजूद था।
रिपोर्ट्स के मुताबिक अब यह सामने आया है कि अमेरिका की दिलचस्पी ईरान के तेल भंडार पर नियंत्रण हासिल करने में रही है। फाइनेंशियल टाइम्स को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ईरान के खार्ग द्वीप पर कब्जा कर सकता है, क्योंकि ईरान अपने उस द्वीप की रक्षा करने में सक्षम नहीं है।
ईरान पर हमले के बाद अमेरिका को यह अंदाजा नहीं था कि ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को इतनी प्रभावी तरीके से बाधित कर सकता है कि समुद्री आवाजाही लगभग ठप हो जाए। तमाम कोशिशों के बावजूद अमेरिका इस मार्ग को पूरी तरह खुलवाने में सफल नहीं हुआ और नाटो देशों से भी अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। इसके बाद ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से तेल को लेकर अपनी प्राथमिकता जाहिर की।
खार्ग द्वीप ईरान की अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा केंद्र माना जाता है। ईरान अपने कुल तेल निर्यात का लगभग 90 प्रतिशत इसी द्वीप के जरिए करता है। फारस की खाड़ी में स्थित इस क्षेत्र के पास गहरा समुद्री इलाका है, जहां दुनिया के सबसे बड़े तेल टैंकर आसानी से लंगर डाल सकते हैं।
यह द्वीप स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बेहद करीब है, जिससे ईरान वैश्विक बाजारों तक कच्चे तेल की आपूर्ति करता है। रणनीतिक दृष्टि से भी यह स्थान बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां से ईरान खाड़ी क्षेत्र की नौसैनिक गतिविधियों पर नजर रख सकता है और अपनी तेल सप्लाई की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
खार्ग में 40 से अधिक बड़े स्टोरेज टैंक मौजूद हैं, जिनकी कुल भंडारण क्षमता लगभग 30–35 मिलियन बैरल बताई जाती है। यहां से रोजाना करीब 1.5 मिलियन बैरल तेल निर्यात किया जाता है। अनुमान है कि केवल तेल निर्यात से ईरान को लगभग 80 बिलियन डॉलर की आय होती है और सरकारी खर्च का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा इसी कमाई से आता है।
खार्ग द्वीप को लेकर ट्रंप की दिलचस्पी नई नहीं है। साल 1988 में ब्रिटिश अखबार द गार्डियन को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि मैं खार्ग पर कब्जा कर लूंगा। उस समय ईरान-इराक युद्ध जारी था और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा अमेरिकी सेना के जिम्मे थी।
तब अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन थे। ट्रंप ने उस दौर में रीगन की नीतियों की आलोचना करते हुए सवाल उठाया था कि अमेरिका उन जहाजों की सुरक्षा क्यों कर रहा है जो उसके अपने नहीं हैं। उस समय भी उन्होंने नाटो देशों पर सहयोग न करने का आरोप लगाया था। इराक ने अमेरिकी समर्थन से खार्ग पर कब्जे की कोशिश की थी, लेकिन वह प्रयास सफल नहीं हो पाया।
वर्तमान संघर्ष के बीच मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी गई है। पहले जहां करीब 40 हजार अमेरिकी सैनिक तैनात थे, वहीं अब यह संख्या 50 हजार से अधिक बताई जा रही है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार 2500 मरीन, 2500 नए नाविक और अमेरिकी सेना की 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के 2000 पैराट्रूपर्स भी क्षेत्र में भेजे गए हैं।
इसके बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि जमीनी स्तर पर ईरान से सीधा मुकाबला करने के लिए यह संख्या पर्याप्त नहीं है। अमेरिका को उम्मीद थी कि इजरायल की सेना सहयोग करेगी, लेकिन इजरायल ने साफ कर दिया है कि उसका कोई सैनिक ईरान की जमीन पर नहीं भेजा जाएगा।
ऐसे में नाटो देशों से अपेक्षित समर्थन न मिलने और इजरायल की दूरी के कारण अमेरिका इस संघर्ष में काफी हद तक अकेला नजर आ रहा है। करीब चार दशक पहले देखा गया खार्ग पर कब्जे का सपना अब भी अधूरा दिखाई देता है।
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