होम जगदीप धनखड़ के इस्तीफे पर हामिद अंसारी ने तोड़ी चुप्पी, बोले- इतने ऊंचे पद से कौन इस्तीफा देता है
पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने जगदीप धनखड़ के उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफे को लेकर एक बड़ा और हैरान करने वाला बयान दिया है. शुक्रवार को अपनी प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने साफ किया कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे की असली वजह उन्हें आज तक समझ नहीं आई.
पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने जगदीप धनखड़ के उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफे को लेकर एक बड़ा और हैरान करने वाला बयान दिया है. शुक्रवार को अपनी प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने साफ किया कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे की असली वजह उन्हें आज तक समझ नहीं आई. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि उपराष्ट्रपति का पद देश का एक बेहद प्रतिष्ठित और ऊंचा पद होता है, और इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया कि किसी ने इस पद से यूं इस्तीफा दे दिया हो.
'सिर्फ राष्ट्रपति बनने पर ही होता है ऐसा'
हामिद अंसारी ने संवैधानिक परंपराओं का हवाला देते हुए कहा कि उपराष्ट्रपति के पद से इस्तीफा देने की नौबत सिर्फ एक ही स्थिति में आती है. उन्होंने कहा, "ऐसा (उपराष्ट्रपति का इस्तीफा) सिर्फ एक ही स्थिति में होता है, जब कोई उपराष्ट्रपति देश का राष्ट्रपति बन जाता है, तब वो अपने पद से इस्तीफा देकर दूसरा पद को ग्रहण करता है. नहीं तो ऐसा ऊंचे पद से कौन इस्तीफा देता है." अंसारी ने अपनी अनभिज्ञता जाहिर करते हुए कहा कि, "यहां क्या हुआ, इसके पीछे की कहानी क्या है, मुझे नहीं पता."
'दबाव नहीं था, बस इस्तीफा दिया और चले गए'
जब हामिद अंसारी से यह सवाल पूछा गया कि क्या जगदीप धनखड़ पर किसी तरह का कोई राजनीतिक या बाहरी दबाव था, तो उन्होंने इसे नकार दिया. अंसारी ने कहा, "उन पर कोई दबाव नहीं था, उन्होंने बस इस्तीफा दिया और चले गए." उनका यह बयान सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है क्योंकि इस्तीफे की असली वजहों पर अभी भी सस्पेंस बरकरार है.
कोटद्वार की घटना और खत्म होता भाईचारा
इस दौरान हामिद अंसारी ने देश के सामाजिक माहौल और उत्तराखंड के कोटद्वार में एक दुकान पर हुए हमले को लेकर भी चिंता जताई. उन्होंने कहा, "जातिवाद एक बात है, भाषा एक अलग बात है और उत्तराखंड में हुई यह घटना, ये सब अलग-अलग नहीं हैं. यह सब इस बात का नतीजा है कि आपसी भाईचारा धीरे-धीरे खत्म हो रहा है."
'अगर इस पौधे को नहीं सींचा, तो मुरझा जाएगा देश'
देश की एकता और विविधता पर बात करते हुए पूर्व उपराष्ट्रपति ने एक भावुक अपील की. उन्होंने कहा, "लद्दाख से लेकर कन्याकुमारी तक जाइए तो क्या समानता है? न उनकी भाषा एक है, न रहन-सहन एक जैसा है, न ही खान-पान, लेकिन एक चीज है जो सबको जोड़ती है कि वे सभी इस देश के नागरिक हैं और यही हमें एकजुट रखती है. अगर उस भावना को, उस पौधे को सींचा नहीं जाएगा, तो वह धीरे-धीरे मुरझाने लगेगा."
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