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भारत की ताबड़तोड़ मदद से क्या तुर्की अपना तेवर छोड़ देगा?
तुर्की और सीरिया में तबाही मचाने वाले भूकंप के बाद भारत मदद भेजने के लिए जिस तरह से मुखर होकर सामने आया, उसे मोदी सरकार की मध्य-पूर्व के प्रति प्रतिबद्धता से जोड़ा जा रहा है.
इससे पहले भारत ने 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस के मौक़े पर मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फ़तेह अल-सीसी को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया था.
मई 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से इसराइल से भी संबंध गहरे हुए हैं और खाड़ी के देशों से संबंधों में गर्मजोशी की बात कही जाती है. नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने 2017 में इसराइल का दौरा किया था.
ईरान के साथ भारत का संपर्क पुराना है और अब तुर्की के साथ भी दोस्ती मज़बूत करने की कोशिश शुरू हो गई है.
जब इन इलाक़ों में अमेरिका की मौजूदगी कमज़ोर पड़ने की बात की जा रही है, तब भारत अपना पैर जमाने की कोशिश कर रहा है.
अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत रहे हुसैन हक़्क़ानी ने 'द डिप्लोमैट' में लिखा है कि भारत आज़ादी के बाद से मध्य-पूर्व में सक्रिय रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में इन इलाक़ों में भारत की संलिप्तता की गुणवत्ता बदली है.
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मोदी की प्राथमिकता मध्य-पूर्व!
हुसैन हक़्क़ानी का मानना है कि बहुध्रुवीय दुनिया में भारत एक वैश्विक शक्ति बनने की तमन्ना के साथ आगे बढ़ रहा है. हक़्क़ानी ने लिखा है, ''तुर्की और सीरिया में भारत की ओर से बड़े पैमाने पर राहत-सामग्री का आना उसकी महत्वाकांक्षा को दिखाता है. भारत अब आपदा की स्थिति में मदद अपने पड़ोसियों से आगे भी पहुँचाने के लिए तत्पर दिख रहा है.''
हुसैन हक़्क़ानी ने लिखा है, ''तुर्की में भारत ने जो हालिया मदद भेजी है, उनमें एक पूरा फ़ील्ड हॉस्पिटल और मेडिकल टीम के साथ मशीन, दवाई के अलावा हॉस्पिटल बेड भी हैं. यह एक रणनीतिक मदद है न कि केवल मानवीय मदद. भारत के इस रुख़ से पूरे मध्य-पूर्व में एक मज़बूत छवि बनेगी. पश्चिम एशिया को लेकर भारत की गंभीरता साफ़ दिख रही है. वो चाहे क्वॉड हो या आईटूयूटू. I2U2 गुट में इसराइल, इंडिया, अमेरिका और यूएई हैं.''
कई विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका का ज़्यादा फ़ोकस चीन और यूक्रेन संकट पर है. ऐसे में मध्य-पूर्व में उसकी मौजूदगी कमज़ोर पड़ रही है.
कहा जा रहा है कि भारत को डर है कि अमेरिका की जगह मध्य-पूर्व में चीन ले सकता है और अगर ऐसा हुआ तो भारत के हितों के ख़िलाफ़ होगा.
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मध्य-पूर्व में भारत के हित
भारत के लिए मध्य-पूर्व निवेश, ऊर्जा और रेमिटेंस का अहम स्रोत है. यह इलाक़ा भारत के सुरक्षा दृष्टिकोण से भी अहम माना जाता है क्योंकि इस्लामिक अतिवाद को लेकर चिंताएं अभी ख़त्म नहीं हुई हैं. भारत चाहता है कि मध्य-पूर्व में अमेरिका कमज़ोर पड़े तो वह इसके लिए पहले से तैयार रहे.
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