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धर्म-परिवर्तन कर होने वाली शादी समस्या है या राजनीति?
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने भाषण में इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश का उल्लेख करते हुए कहा है कि 'शादी-ब्याह के लिए धर्म-परिवर्तन आवश्यक नहीं है, नहीं किया जाना चाहिए और इसको मान्यता नहीं मिलनी चाहिए. सरकार भी निर्णय ले रही है कि हम लव-जिहाद को रोकने के लिए सख़्ती से कार्य करेंगे. एक प्रभावी क़ानून बनाएंगे.'
हालांकि 'लव-जिहाद' शब्द की कोई क़ानूनी हैसियत नहीं है. इसे ना ही अबतक किसी क़ानून के तहत परिभाषित किया गया है और न ही केंद्र या राज्य की किसी एजेंसी ने किसी क़ानूनी धारा के तहत इम मामले में कोई केस दर्ज किया है.
गृह मंत्रालय भी कहता है कि जबरन अंतरजातीय विवाह को 'लव-जिहाद' कहा जा रहा है.
एक सांसद के सवाल पर गृह राज्य मंत्री जी कृष्ण रेड्डी ने ये जवाब दिया था और संविधान में उल्लेखित धर्म की आज़ादी पर अनुच्छेद 25 का भी उल्लेख किया था.
योगी ने हाल ही में मल्हनी (जौनपुर) सीट पर होने वाले उपचुनाव के प्रचार के दौरान जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था, ''छद्म भेष में चोरी-छिपे, नाम छिपाकर, स्वरूप छिपाकर जो लोग बहन-बेटियों की इज़्ज़त के साथ खिलवाड़ करते हैं, उनको पहले से मेरी चेतावनी है कि अगर वे सुधरे नहीं तो राम-नाम सत्य है की यात्रा अब निकलने वाली है. मिशन शक्ति को इसलिए चला रहे हैं कि हम बेटी-बहन को सुरक्षा की गारंटी देंगे. उसके बावजूद किसी ने दुस्साहस किया तो ऑपरेशन शक्ति अब तैयार है. ऑपरेशन शक्ति का उद्देश्य यही है कि हम हर हाल में उनकी सुरक्षा करेंगे, उनके सम्मान की रक्षा करेंगे इसलिए ऑपरेशन शक्ति के कार्यक्रम को बढ़ाने के लिए हम चल रहे हैं, न्यायालय के आदेश का पालन भी होगा और बहन-बेटियों का भी सम्मान होगा."
जनसभा को दिए संबोधन में मुख्यमंत्री योगी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश और मिशन-शक्ति का उल्लेख किया.
उत्तर प्रदेश सरकार ने पिछले महीने नवरात्र के दौरान मिशन-शक्ति की घोषणा की थी जिसके तहत महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कई क़दम उठाए गए हैं लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट के जिस आदेश का योगी ज़िक्र कर रहे हैं उसका संदर्भ क्या था?
दरअसल, अदालत के समक्ष एक अंतरजातीय वैवाहिक जोड़े ने रिट याचिका दायर कर पुलिस सुरक्षा माँगी थी.
इस याचिका को ख़ारिज करते हुए अदालत ने कहा था कि शादी के लिए धर्म-परिवर्तन स्वीकार्य नहीं है. उत्तर प्रदेश के इस जोड़े ने अदालत से गुहार लगाई थी कि अदालत महिला के पिता को उनकी शांतिपूर्ण शादीशुदा ज़िंदगी में दख़ल देने से रोक.
याचिका सुनने के बाद अदालत ने पाया कि महिला मुस्लिम थी और उन्होंने शादी से पहले धर्म-परिवर्तन किया था. एक सदस्यीय बेंच का कहना था कि धर्म-परिवर्तन शादी के लिए हुआ था. इस बेंच ने वर्ष 2014 के एक आदेश का उल्लेख करते हुए कहा, ''शादी के लिए धर्म-परिवर्तन स्वीकार्य नहीं है और संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत वो ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती है और इस याचिका को रद्द करती है.''
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