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असदुद्दीन ओवैसी की एंट्री, राजद और कांग्रेस के छूट रहे हैं पसीने, मुस्लिम मतदाताओं पर फोकस
बिहार विधानसभा चुनाव में इसबार मुस्लिम प्रत्याशियों का सटीक चयन राजद ही नहीं, सभी स्थानीय दलों के सामने बड़ी चुनौती बनती जा रही है.
कारण कि इसबार एआइएमआइएम मुस्लिम मतदाताओं के बीच प्रभावी दखल देने जा रहा है. ऐसे में तमाम पार्टियां दमखम वाले मुस्लिम उम्मीदवारों की तलाश में जुट गई हैं. इसतरह सभी राजनीतिक पार्टियां सामाजिक समीकरणों को साधने में जुटी हैं. राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी राजद के मुखिया लालू प्रसाद यादव मुस्लिम-यादव (माय) समीकरण की बदौलत 15 साल तक शासन कर चुके हैं.
ऐसे में राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अभी भी राजद इसी सामाजिक समीकरण की बदौलत सत्ता में वापसी के सपने देख रहा है. लेकिन हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआइएमआइएम की एंट्री से राजद की अगुवाई वाले महागठबंधन के समीकरण बिगड़ने की आशंका है.
उपचुनाव में उसके पक्ष में मुस्लिम वोटर्स का रुझान सामने आ चुका
दरअसल, पिछले साल किशनगंज विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में उसके पक्ष में मुस्लिम वोटर्स का रुझान सामने आ चुका है. ऐसे में एआइएमआइएम ने इस बार अगर प्रभावी वोट काटे तो मुस्लिम मतदाताओं पर मजबूत पकड़ का दावा करने वाले महागठबंधन के राजद व वाम दल समेत एनडीए को भी अपना पुराना प्रदर्शन दोहराना चुनौतीपूर्ण होगा.
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक प्रदेश के कुल मतदाताओं में 18 फीसदी से अधिक भागीदारी मुस्लिम मतदाताओं की है. यह मतदाता इस समय दोराहे पर खडा है. एक तरफ एनआरसी और उससे संबंधित मुद्दे हैं, जिसने एआइएमआइएम के लिए जमीन तैयार की है. वहीं, महागठबंधन के राजद और कम्युनिस्ट दलों जुगलबंदी मुस्लिम मतदाता की परंपरागत पसंद रहे हैं.
हालांकि, जदयू ने एनडीए का घटक अंग होने के बाद भी मुसलमान मतदाताओं का भरोसा जीता है. ये सभी दल ने एआइएमआइएम की दस्तक से आशंकित होकर उसे वोटकटवा जरूर कह रहे हैं, लेकिन पूरी ताकत इन लोगों ने मुस्लिम सीटों पर रसूखदार प्रत्याशी तय करने में लगा रखी है.
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