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नरेंद्र मोदी को संकट के वक्त क्यों याद आते हैं राजनाथ सिंह?
साल 2010 में नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल का गठन होते वक़्त जब राजनाथ सिंह को गृह मंत्रालय के बजाय रक्षा मंत्री का कार्यभार दिया गया तो लगा कि उनका क़द कुछ घटा दिया गया है. गृह मंत्रालय में अमित शाह की ताज़पोशी से राजनाथ सिंह ने भी खुद को एक तरह से समेट लिया.
लेकिन वे नरेंद्र मोदी सरकार में अहम बने रहे और इसका अहसास लोगों को एक बार फिर से तब हुआ जब किसानों के लिए प्रस्तावित नए क़ानूनों को लेकर संसद से लेकर सड़क तक मचे हंगामे में सरकार का पक्ष रखने के लिए एक बार फिर से उन्हें ही आगे किया गया और राजनाथ सिंह 'मैं भी किसान हूं' कहते हुए इन क़ानूनों का समर्थन करते हुए फिर से संकटमोचक के तौर पर दिखाई दिए.
ये कोई पहला मौका नहीं है जब राजनाथ सिंह सरकार के लिए संकटमोचक के तौर पर दिखाई दिए हैं. मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान भी चाहे किसानों का विरोध प्रदर्शन रहा हो, या फिर जम्मू कश्मीर में हुई हिंसा हो या जाट आरक्षण को लेकर हुआ हिंसक आंदोलन हो, राजनाथ मुस्तैदी से सरकार का बचाव करते नज़र आए.
राजनीतिक गलियारे में ढेरों लोग हैं जो राजनाथ सिंह को अटल बिहारी वाजपेयी की परंपरा से जोड़कर देखते हैं, ऐसा नेता जिसका कोई शत्रु नहीं हो और अपनी इस काबिलियत के चलते राजनाथ सरकार के लिए मुश्किलों के वक्त में रास्ता निकाल ही लेते हैं.
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