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कश्मीरी पंडितों के लिए अभी भी घाटी में लौटना आसान नहीं
जम्मू कश्मीर से आर्टिकल 370 के हटने का 1 साल पूरा होने जा रहा है। हालांकि, आर्टिकल 370 के खात्मे के बाद जम्मू कश्मीर की स्थिति कितनी बदली यह एक बहस का और विचार का मुद्दा जरूर हो सकता है। लेकिन एक बात और भी है कि आर्टिकल 370 के हटने के बाद जम्मू कश्मीर की स्थितियों में बदलाव की शुरूआत हो गई है। जम्मू कश्मीर में विकास को आम जनजीवन तक पहुंचाना है तो उसके लिए वहां सबसे पहले शांति बहाल किए जाने की जरूरत है। दो केंद्र शासित प्रदेशों में बंटने के बाद जम्मू-कश्मीर की सरकार वहां शांति बहाल करने की कवायद में जुटी हुई है। ऐसा नहीं है कि आर्टिकल 370 के हटने के बाद वहां अचानक से शांति बहाल हो गई है। आर्टिकल 370 के खात्मे के बाद हमने देखा कि किस तरीके से वहां अब भी आतंकवाद और हिंसा जारी है। हम यह जरूर कह सकते हैं कि वहां पहले की तुलना में हिंसा में कमी जरूर आई है।पिछले 1 साल में छिटपुट हिंसा से जम्मू कश्मीर में नेताओं को भी का शिकार होना पड़ा है। इसमें सबसे ज्यादा नुकसान भारतीय जनता पार्टी हुई है। भाजपा के कई नेताओं को अपनी जान गंवानी पड़ी है।दरअसल, पिछले दिनों ही कश्मीर के बांदीपोरा जिले में भाजपा नेता शेख वसीम, उनके पिता वसीर अहमद और भाई उमर शेख की आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी। आतंकवादियों ने भाजपा नेता बारी पर साइलेंसर लगी रिवॉल्वर से गोलियां दागी। यह घटना मुख्य थाने से महज 10 मीटर की दूरी पर हुई। आतंकवादियों की इस खौफनाक हरकत के बाद घाटी के भाजपा नेताओं में डर का माहौल है। इससे पहले इससे पहले आतंकवादियों ने भाजपा नेता अनिल परिहार और उनके भाई अजीत परिहार को किश्तवाड़ा में गोली मारकर हत्या कर दी थी। अनिल और अजीत परिहार की हत्या के बाद भी घाटी में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर खूब सवाल उठे। हालांकि इसी दौरान एक और खौफनाक घटना को अंजाम देते हुए आतंकवादियों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता चंद्रकांत शर्मा और उनके पीएसओ की भी हत्या कर दी गई।
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