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मध्य प्रदेश कांग्रेस में बिखराव रोकने का करिश्मा नहीं कर सके मुकुल वासनिक
कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अप्रैल के आखिरी दिनों में पार्टी के महासचिव मुकुल वासनिक को मध्य प्रदेश का प्रभार सौंपा तो यह उम्मीद और अपेक्षा थी कि वह राज्य संगठन को मजबूती देंगे। पर मुकुल वासनिक अपने पूर्ववर्ती प्रभारी दीपक बाबरिया की तरह ही कमजोर साबित हुए। वह मप्र कांग्रेस में बिखराव रोकने में कोई करिश्मा नहीं कर सके। वासनिक के आने के बाद भी कांग्रेस के विधायकों के इस्तीफे का सिलसिला बना हुआ है।
सिंधिया संग 22 विधायकों के टूटने पर कांग्रेस प्रभारी बाबरिया ने दिया था इस्तीफा
दूसरी तरफ विरासत के जरिये सियासत में चमके नई पीढ़ी के युवराजों की लड़ाई सतह पर आ गई है। मार्च के महीने में मध्य प्रदेश में कमल नाथ की सरकार से बगावत कर कांग्रेस के ही विधायकों ने जब मोर्चा खोला तो राज्य में संगठन के प्रभारी होने के नाते दीपक बाबरिया की पहली जिम्मेदारी थी कि वह सामंजस्य स्थापित करें लेकिन अनुशासनहीनता, आपसी खींचतान और गुटबाजी ने उन्हें चुप बैठने पर मजबूर कर दिया। कमल नाथ सरकार के पतन के बाद बाबरिया ने खराब स्वास्थ्य का हवाला देकर इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उसे स्वीकार भी कर लिया। बाबरिया ने मध्य प्रदेश का प्रभार संभालने के बाद बहुत मुश्किलों का सामना किया था। उनके प्रभारी रहते कार्यकर्ताओं की आपसी मारपीट और बदतमीजी सामने आई थी।
सिंधिया, कमल नाथ के बीच जंग में बाबरिया पीछे हटे
पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमल नाथ के बीच की लड़ाई तेज होने तक दीपक बाबरिया ने खुद को समेट लिया। जब पार्टी के विधायक और मंत्री बेंगलुर में मोर्चाबंदी में जुटे थे तो उन्हें संभालने की जिम्मेदारी उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और मुकुल वासनिक को दी गई। इन नेताओं की कोशिश कामयाब नहीं हुई और कमल नाथ को सत्ता गंवानी पड़ी। कांग्रेस सरकार के छह मंत्रियों समेत 22 विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। शिवराज की सरकार बनने की बुनियाद पड़ी और भाजपा ने कांग्रेस के हाथ से सत्ता छीन ली।
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