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निर्भया के दोषियों को 3 मार्च सुबह 6 बजे होगी फांसी
सैन्य बलों में लैंगिक भेदभाव खत्म करने पर जोर देते हुये उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को सेना में महिला अधिकारियों के कमान संभालने का मार्ग प्रशस्त कर दिया और केन्द्र को निर्देश दिया कि तीन महीने के भीतर सारी महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन दिया जाये। न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड की अध्यक्षता वाली पीठ ने सरकार की इस दलील को विचलित करने वाला और समता के सिद्धांत के विपरीत बताया जिसमें कहा गया था कि शारीरिक सीमाओं और सामाजिक चलन को देखते हुए कमान पदों पर नियुक्ति नहीं की जा रही। पीठ ने कहा कि महिला अधिकारियों ने पहले भी देश का सम्मान बढ़ाया है और उन्हें सेना पदक समेत कई वीरता पदक मिल चुके हैं। सेना में लैंगिक समानता के मार्ग में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुये पीठ ने कहा कि सैन्य बलों में लैंगिक दुराग्रह खत्म करने के लिये सरकार को अपनी सोच बदलनी होगी। न्यायालय ने कहा कि महिलाओं की कमान में नियुक्ति किये जाने पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं होगा। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि जैसा कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि युद्धक भूमिका में महिला अधिकारियों की तैनाती नीतिगत मामला है और इस बारे में सक्षम प्राधिकारियों को विचार करना होगा। पीठ ने कहा कि महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने संबंधी उच्च न्यायालय के 2010 के फैसले को रोक नहीं होने के बावजूद सरकार ने पिछले एक दशक में इन निर्देशों को लागू करने के प्रति नाम मात्र का सम्मान दिखाया है।
लोगों को प्रदर्शन करने का अधिकार है लेकिन अवश्य ही संतुलन रखना होगा : शीर्ष न्यायालय
उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि किसी कानून के खिलाफ प्रदर्शन करने का लोगों के पास मूल अधिकार है लेकिन सड़कों को अवरूद्ध किया जाना चिंता का विषय है और अवश्य ही एक संतुलन रखना होगा। संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) के खिलाफ शाहीन बाग में चल रहे प्रदर्शनों के कारण सड़कें अवरूद्ध होने को लेकर दायर की गई याचिकाओं की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति एस के कौल और न्यायमूर्ति के एम जोसेफ की पीठ ने कहा कि न्यायालय को इस बात की चिंता है कि यदि लोग सड़कों पर प्रदर्शन करना शुरू कर देंगे, तो फिर क्या होगा। न्यायालय ने कहा कि लोकतंत्र विचारों की अभिव्यक्ति पर चलता है लेकिन इसके लिए भी सीमाएं हैं। पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े और वकील साधना रामचंद्रन को प्रदर्शनकारियों से बात करने और उन्हें ऐसे वैकल्पिक स्थान पर जाने के लिए मनाने को कहा, जहां कोई सार्वजनिक स्थल अवरुद्ध नहीं हो। बहरहाल, न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई की तिथि 24 फरवरी तय की। पीठ ने कहा कि लोगों को प्रदर्शन करने का मूल अधिकार है लेकिन जो चीज हमें परेशान कर रही है, वह सार्वजनिक सड़कों का अवरूद्ध होना है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि शाहीन बाग प्रदर्शन से यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि हर संस्था इस मुद्दे पर शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों को मनाने की कोशिश कर रही है।
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