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ऐसे कीजिए भूमि का चयन
वास्तुशास्त्र भारत का अत्यन्त प्राचीन शास्त्र है। प्राचीन काल में वास्तुकला सभी कलाओं की जननी कही जाती थी। आज भी जितने भवन और बिल्डिंग आदि बन रही है अधिकांश में वास्तु के हिसाब से ही निर्माण किया जा रहा है। आवासीय . मकान एवं फ्लैट ए व्यावसायिक .व्यापारिक एवं औद्योगिक और धार्मिक. धर्मशालाए जलाशय एवं धार्मिक संस्थान। वास्तु में भूमि का विशेष महत्व है। भूमि चयन करते समय भूमि या मिट्टी की गुणवत्ता का विचार कर लेना चाहिए।भूमि परीक्षण के लिए भूखंड के मध्य में भूस्वामी के हाथ के बराबर एक हाथ गहराए एक हाथ लंबा एवं एक हाथ चैड़ा गड्ढा खोदकर उसमें से मिट्टी निकालने के पश्चात् उसी मिट्टी को पुनः उस गड्ढे में भर देना चाहिए।ऐसा करने से यदि मिट्टी शेष रहे तो भूमि उत्तमए यदि पूरा भर जाए तो मध्यम और यदि कम पड़ जाए तो अधम अर्थात् हानिप्रद है।अधम भूमि पर भवन निर्माण नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार पहले के अनुसार नाप से गड्ढा खोद कर उसमें जल भरते हैंए यदि जल उसमें तत्काल शोषित न हो तो उत्तम और यदि तत्काल शोषित हो जाए तो समझें कि भूमि अधम है। भूमि के खुदाई में यदि हड्डीए कोयला इत्यादि मिले तो ऐसे भूमि पर भवन नहीं बनाना चाहिए।यदि खुदाई में ईंट पत्थर निकले तो ऐसा भूमि लाभ देने वाला होता है। भूमि का परीक्षण बीज बोकर भी किया जाता है। जिस भूमि पर वनस्पति समय पर उगता हो और बीज समय पर अंकुरित होता हो तो वैसा भूमि उत्तम है। जिस भूखंड पर थके होकर व्यक्ति को बैठने से शांति मिलती हो तो वह भूमि भवन निर्माण करने योग्य है। वास्तु शास्त्र में भूमि के आकार पर भी विशेष ध्यान रखने को कहा गया है।वर्गाकार भूमि सर्वोत्तमए आयताकार भी शुभ होता है। इसके अतिरिक्त सिंह मुखी एवं गोमुखि भूखंड भी ठीक होता है। सिंह मुखी व्यावसायिक एवं गोमुखी आवासीय दृष्टि उपयोग के लिए ठीक होता है।किसी भी भवन में प्राकृतिक शक्तियों का प्रवाह दिशा के अनुसार होता है। यदि भवन सही दिशा में बना हो तो उस भवन में रहने वाला व्यक्ति प्राकृतिक शक्तियों का सही लाभ उठा सकेगाए किसकी भाग्य वृद्धि होगी।
अपना घर अपना होता है। यह जुमला हम जब भी सुनते हैं। एक अपनेपन का अहसास जरूर होता है। लेकिन जब हम अपना घर या कार्यालय बनवाएं तो भूमि चयन करते समय वास्तु शास्त्र को जरूर आधार बनाएं। साथ में ये उपाय जरूर आजमाएं।
ऽ भूमि ऐसी जगह न हो जहां गली या रास्ते का अंत होता हो।
ऽ जहां तीन रास्ते एक साथ मिलते होंए वहां भूमि न लें। यह अशुभ होती है।
ऽ यदि भूमि खोदने पर हड्डी या फटा कपड़ा मिले तो भूमि अशुभ होती है।
ऽ यदि भूमि खोदते समय खप्पर मिले तो भूमि पर बनने वाला घर कलहकारी होता है।
ऽ भूमि खरीदते समय ध्यान रखें भूमि का रंग कैसा भी हो लेकिन वह चिकनी होनी चाहिए।
ऽ जिस भूमि पर पहले कभी श्मशान रहा हो वह भूमि अपशकुनी होती है।
ऽ भूमि का चयन करते समय यह जरूर देखें की भूमि बंजर न होए उसमें कुछ न कुछ उत्पन्न होता हो।
ऽ भूमि में एक गड्डा खोदेंए उसमें पानी भर दें। वहां से पूर्व दिशा की और 100 कदम चलें। और लौट आएं। यदि उस गड्डे में पानी पूरा फुल है। यदि पानी पूरा भरा है तो अत्यंत श्रेष्ठ है। आधा खाली है तो भूमि मध्यम फल देने वाली है। यदि पूरा पानी सूख जाए तो भूमि व्यक्ति के लिए भाग्यशाली नहीं होती।
ऽ अपना मकान या कार्यस्थल ऐसी जगह बिल्कुल भी न बनाएं जिसके उत्तर.पूर्व दिशा में ऊंचे भवनए पर्वत या पीपल का पेड़ हो।
ऽ भूमि की मिट्टी पीली या सफेद है तो वह श्रेष्ठ है यदि लाल है तो मध्यम और काले वर्ण की मिट्टी है तो ठीक नहीं मानी जाती है।
ऽ भवन के लिए भूमि खरीदते समय यह ध्यान रखें कि उसके उत्तर.दक्षिण में तालाब या नदी न हो ऐसी जगह धन का नाश करती है।
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