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आम आदमी की लड़ाई में चुपचाप शामिल एक कवि कुमार मुकुल
हिंन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह की रचनाओं का संचयन चर्चित कवि लीलाधर मंडलोई के संपादन में इस वर्ष भारतीय ज्ञानपीठ से आया है। इसमें केदार जी की कविताओं के अलावा उनके कुछ निबंध, सुधीश पचौरी और अनामिका द्वारा लिए गए दो साक्षात्कार और कुछ अनुवाद संकलित हैं। केदारनाथ सिंह हिंदी के अकेले कवि हैं, जो कविता की उदात्त परंपरा से लड़ते रहते हैं और उसका विकेंद्रीकरण करते हैं। ऐसा करते हुए वे चुपचाप आम आदमी की लड़ाई में शामिल हो जाते हैं और इतना निकट पहुंच जाते हैं कि अविश्वास की स्थिति पैदा कर देते हैं कि वे इस संघर्ष में शामिल हैं भी या नहीं? और ऐसा कर वह स्वयं को महाकवित्व के उदात्तबोध तथा उसकी कुंठाजन्य मानसिक विक्षिप्तता, जिसकी एक परंपरा रही है, दोनों ही से मुक्त रहते हैं। इसीलिए जब वे कहते हैं कि - और एक सुबह मैं उठूंगा मैं उठूंगा पृथ्वी समेत। तब हमें विस्मय नहीं होता क्योंकि, इसके पहले वे पृथ्वी को इतनी हल्की बना चुके होते हैं कि कोई भी उसकी एक पोटली बना अपनी कांख में दाबे चल सकता है - यह पृथ्वी रहेगी यह रहेगी जैसे पेड़ के तने में रहते हैं दीमक, जैसे दाने में रह लेता है घुन। सौंदर्य की सृष्टि करनी हो या किसी हकीकत को दर्शाना हो अपनी रहस्यमयी भाषा की आधारशिला वो यथार्थ की वैश्विक पृष्ठभूमि में रखते हैं और हमें चकित होना पड़ता है कि अरे यह भी सच है - वे ताबड़-तोड़, बांध रहे हैं अपने बोझे जैसे चुराए गए हों सूरज की टाल से। केदारजी की एक महत्त्वपूर्ण कविता है 'टमाटर बेचने वाली बुढ़ियाÓ, जिसमें वह बुढ़िया के चेहरे की तुलना टोकरी से करते हैं। यहां वे श्रम ही नहीं देखते, करुणा भी देखते हैं, जो अपने बेटे के लिए बुढ़िया के जेहन में है, जिसके लिए वह बोझ ढोती है और खुद टोकरी की तरह जीवन को ढोकर भी खाली रह जाती है - मुझे टमाटरों की रोशनी में उसका लहकता चेहरा दिखाई पड़ता है यह मां का चेहरा है। और यह लहक मात्रा टमाटरों का प्रतिबिम्ब नहीं है। इन टमाटरों में उसके बेटे की छवि भी छिपी है। जीवन और प्रकृति में जरूरत से ज्यादा कृत्रिम हस्तक्षेप केदार जी पसंद नहीं करते। वे चेतावनी देते हैं कि बंदी बनाकर हम प्रकृति तथा जीवन के सौंदर्य को सक्रिय नहीं रख सकते। नुचे हुए परों और पंखुरियों से सजी सेज को वे गर्हित दृष्टि से देखते हैं और वहां उनका दृष्टिकोण अतिमानवीय हो जाता है। इस संदर्भ में वे खुद को भी माफ नहीं कर पाते - उसने मुझे एक बार एक अजब-सी कातर दृष्टि से देखा और दम तोड़ दिया तब से मैं डरने लगा शब्दों से। 'धब्बाÓ शीर्षक से उनकी एक कविता है। यह धब्बा रक्त का है, जो किसी भी पीड़ित व्यक्ति का हो सकता है, जिसमें हत्यारे का चेहरा दमक रहा है और जो बीच सड़क पर पड़ा कराह रहा है, जिसे कोई सुन नहीं रहा है। यहां तक कि कराह सूखकर मर जाती है। काली हो जाती है। समय भी अपनी गति से उसके पास आता है। वह भी हत्यारे के पक्ष में उसे धोकर मिटा देता है, ताकि हत्यारा पहचान में ना आ सके - अब बारिश खुश कि उसने धो डाला धब्बे को धब्बा खुश कि जैसे वह कभी सड़क पर था ही नहीं। यहां इसकी तुलना रघुवीर सहाय की कविता 'रामदासÓ से करें, तो यथार्थ पर प्रकाश पड़ता है। रामदास कविता में रामदास की हत्या का विवरण तटस्थ ढंग से दिया जाता है और दर्शाया जाता है कि स्थिति इतनी विषम है कि किसी के पक्ष में जाना खतरनाक है। बस इसकी खबर दी जा सकती है। इस कविता में पत्रकारिता का दृष्टिकोण कवि पर हावी है और सरल और गतिशील होकर भी कविता यांत्रिक हो जाती है। पर इसके मुकाबले 'धब्बाÓ में अपनी मनोविज्ञानी अस्पष्टता के बावजूद कवि धब्बे से तटस्थ नहीं है। वह रेखांकित करता है कि धब्बे को भय है, वह अपना चेहरा छुपा ले जाना चाहता है, जिसमें समय (बारिश) उसकी मदद करती है, पर उसका एक गवाह कवि है और वह रामदास की हत्या के विवरणकर्ता की तरह तटस्थ नहीं है। यहां यह ध्यान देने योग्य है कि जहां धब्बे में हत्यारे को डर है और अपनी पहचान मिटने पर वह खुश हो रहा है वहीं रामदास में जनता ही सहमी है। यहां मीडिया और खबरों के दबाव में कवि हत्या का मनोविज्ञान भी भूल जाता है कि डर हमेशा हत्यारे को होता है जिसके दबाव में वह हत्या करता है। जनता का डर तात्कालिक होता है, जिससे वह देर-सबेर संगठित होकर निपट लेती है। ऐसे में कवि को जनता का डर बढ़ाना नहीं चाहिए क्योंकि उसे डराना उसको हत्यारा बनाना है। समाचार पत्रों के खबर देने के ढंग का ही नतीजा है कि इधर भीड़ आक्रामक होकर धैर्य खोती जा रही है। नतीजतन हत्यारा कहीं छिपा रहता है और पावरोटी चुराकर भागने वाले को भी जनता खदेड़ कर मार दे रही है। नागार्जुन की एक प्रसिद्ध कविता है - 'शासन की बंदूकÓ जली ठूंठ पर बैठकर गई कोकिला कूक बाल न बंका कर सकी शासन की बंदूक। केदारजी कि कविता भी उसी कोकिल की तरह है। निराशा जब हमें ठूंठ कर जाती है, तो सारी पहरेदारी के बाद भी वह अंतर्मन में पैठकर भीतर के अंकुरों को अपनी स्वर लहरी से सजीव और सजग कर जाती है। संचयन के संपादक लीलाधर मंडलोई केदार जी के बारे में कहते हैं कि - 'भोजपुरी और ग्रामीण संवेदना का जब एक द्वन्द्वात्मक मेल खड़ी बोली और नागर संवेदना से होता है तो जो नया कवि रूप बनता है- दरअसल उसी पहचान का नाम केदारनाथ सिंह है।Ó केदार जी भोजपुरी भाषी हैं और उनकी भोजपुरी बलिया, छपरा की वह मीठी भोजपुरी है जो अपनी मिठास में मैथिली का मुकाबला कर सकती है, यह मिठास केदार जी के व्यक्तित्व का भी एक हिस्सा है। एक सरल सी आत्मीयता जो उनकी कविताओं में बारहा मिलती है, आपको धीरे-धीरे अपने साथ लेती चलती है और फिर जीवन जगत के अपने अनुभवों को आपसे साझा करती है और आप बच्चों की तरह विस्मित आंखें फाड़े उन्हें देखते जाते हैं और मजेदार यह कि कवि भी बच्चों की तरह विस्मय की भाषा में ही अपनी बात आपसे कहता है। अपनी कविता 'भोजपुरीÓ में केदार जी लोकभाषा भोजपुरी के सकारात्मक पक्ष को जिस संवेदनशीलता के साथ सामने रखते हैं वह अनोखा है - लोकतन्त्र के जन्म से बहुत पहले का एक जिन्दा ध्वनि-लोकतन्त्र है यह जिसके एक छोटे से 'हमÓ में तुम सुन सकते हो करोड़ों 'मैं Ó की घड़कनें लोक की और लोकभाषा की, जिसे अक्सर बोली कहकर हम सीमित करने की कोशिशें करते हैं, ताकत और व्यापकता को जिस तरह से केदार जी सामने रखते हैं वह महत्वपूर्ण है। यह कविता मात्र भोजपुरी की ही बात नहीं करती यह तमाम लोकभाषाओं की जरूरत की भी वकालत करती है जिसकी अंग्रेजी से लड़ने के तर्क से हम उपेक्षा करते हैं और भूल जाते हैं कि हिन्दी की सारी थाती इन्हीं लोकभाषाओं की देन है। कि राज नहीं-भाषा भाषा-भाषा सिर्फ भाषा रहने दो मेरी भाषा को अरबी-तुर्की बांग्ला तेलुगू यहां तक कि एक पत्ती के हिलने की आवाज भी मैं सब बोलता हूं जरा-जरा जब बोलता हूं हिन्दी केदार जी की कविताओं की तरह उनका गद्य भी एक आत्मीय सहजता से पाठकों को अपने साथ लेता चलता है। यह आत्मीयता अक्का महादेवी, कुमार आशान से लेकर गुर्रम आशुआ और भिखारी ठाकुर तक जैसे भिन्न भाषा और परिवेश के रचनाकारों से हमारा परिचय कराती चलती है। उनके अनुवादों में भी हमें वह बड़ा कैनवस दिखता है जहां हम शक्ति चट्टïोपाध्याय और नारायण सुर्वे से लेकर नेरुदा और ब्रेख्त तक की रचनाओं के रूबरू होते हैं। कुल मिलाकर यह संचयन केदार जी के रचना संसार के विविध पहलुओं से एक साथ परिचित होने का पाठकों को मौका देता है।
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