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यशस्वी संपादक की छवि का अतिक्रमण
अखिलेश को अभी तक हिंदी समाज एक यशस्वी संपादक और कथाकार के रूप में ही पहचानता है, लेकिन बनास जन पत्रिका का आख्यान में अखिलेश अंक उनके जीवन के कई अनछुए पहलुओं को उजागर करता है, जिनसे अभी तक हम लोग अनजान रहे हैं। वे बेटी लावनी की नजऱ में प्रगतिशील पिता है,वह कहती है कि कभी उन्होंने हमेशा हमें उचित आज़ादी दी है जीवन के हर मोड़ पर। अपनी इच्छाएं जरुर रखी हैं ...परन्तु दबाव का तो प्रश्न ही नहीं उठा. वीरेंद्र यादव के अनुसार वे लेखक की पारम्परिक छवि का अतिक्रमण करने वाले अखिलेश व्यावहारिक जीवन में भी वे गैर-लेखक सरीखा आचरण करते हैं। यानि नियमित आयकर रिटर्न भरते हैं, बीमा की किश्त चुकाते हैं,और वे बैंक के उन गिने-चुने ग्राहकों में से है जो अपने ऋण-भुगतान को लेकर सतर्क रहते हैं7 तो दूसरी वे उन भविष्यवाणियों को झुठलाते हैं जिनमें कहा गया था कि तद्भव की यश-गाथा ज्यों-ज्यों बढ़ेगी उनका लेखन प्रभावित होगा।
उनके लेखकीय जीवन का मूल्यांकन करने के लिए इस अंक में ममता कालिया,स्वयं प्रकाश जैसे उपन्यासकार,राजेश जोशी जैसे कवि और वरिष्ठ आलोचक नवल किशोर सहित लगभग पचास लेखक मौजूद है। साहित्य की कोई भी विधा हो अखिलेश हमेशा एक अप्रतिम गद्यकार के रूप में हमारे सामने आते हैं,और वे गज़ब के किस्सागो हैं,तभी तो इस अंक में लिखा गया है कि उनकी कहानी पढ़ते समय अकसर एक बोलता हुआ कथावाचक झांकता रहता है7लिखित होने के बावजूद अपनी वाचिकता सुरक्षित रखती उनकी कहानियों में संभवत: गज़ब की पठनीयता है। इस अंक के संपादक राजीव कुमार स्वयं एक समर्थ कथाकार हैं और युवा लेखन के प्रतिनिधियों में हैं अत: यह स्वाभाविक था कि बड़ी संख्या में युवा अलेखक और आलोचक यथा हरेप्रकाश उपाध्याय, शशिभूषण द्विवेदी, जीतेन्द्र श्रीवास्तव, रेणु व्यास, मनोज कुमार पाण्डेय, मोहम्मद आरिफ इत्यादि रचनाकार-आलोचक इस अंक में सम्मिलित हैं। युवाओं का इस तरह किसी एक लेखक पर लिखना इधर की विरल घटना है।
अपने खिलंदड़े स्वभाव के कारण वे अपनी बात बेहद रोचक ढंग से रखते हैं, जब राजीव उनसे सवाल करते है –आपके कहानीकार व्यक्तित्व का प्रमुख आयाम क्या है ? तब वे कहते है कोई एक स्वरूप नहीं है7 हम सभी यदि गहराई से देखे तो एक के भीतर एक अनेक इन्सान,छवियाँ और भाव होते है ,जैसे कोई आदमी कभी रोता है ,कभी हँसता है ..ऐसे में किसी लेखक से यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि उसकी रचनात्मकता का कोई एक ही चेहरा हो7 लोगों द्वारा उनकी रचनायों पर नाक-भों सिकोडऩे के बारे में पूछे जाने पर बडे ही बेबाक ढंग से कहते हैं-लोगों ने प्रेमचंद और मंटो जैसे महान लेखकों को भी नहीं बख्सा तो मेरी क्या बिसात है ? जब अखिलेश ने तद्भव का प्रारंभ किया तब लिखा था- जीवनयापन का जो काम हो उसमें नोकरी का अनुशासन न हो,सर्जनात्मक सुख और काम का दीर्घजीवी मूल्य हो7 आज वास्तव में उनके कार्य का दीर्घजीवी मूल्य हमारे सामने हैं,जिसके मूल्यांकन का प्रयास इस अंक में सफलतापूर्वक किया गया है।
अखिलेश के बहुचर्चित उपन्यास निर्वासन की कई समीक्षाएं हमारे सामने आयी लेकिन वरिष्ठ आलोचक नवल किशोर की टिप्पणी उनसे अलग नजरिया प्रस्तुत करती है, मेरे विचार में निर्वासन यथार्थवादी उपन्यास है,परम्परित प्रगतिशील पद्धति का नहीं, प्रयोगशील का,जो बंद सीमांतों को खोलता है और नई राहे तलाशता है7 अपने समय और समाज की सचाईयों को उजागर करना,साधारण जन के उत्पीडन को प्रत्यक्ष करना, नैतिक सवालों को उठाना, गैर-बराबरी के विरुद्ध राजनीतिक आवाज़ को बल देना –मोटे तौर पर यथार्थवाद की यही पहचान है। निर्वासन ऐसा करता है। ...........पात्र-परिकल्पना भी यथार्थवादी है, पर विशिष्ट। अखिलेश हमारी दुनिया से कुछ नुमाइन्दे चुनते हैं, उनके प्रतिरूप गढ़ते है, लेकिन उन्हें कुछ अजीबोगरीब भी बना देते हैं (टिपिकल बट यूनिक)।
बनास जन का उन पर केन्द्रित यह अंक उनके व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों को ही एक व्यापक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करता है। किसी कथाकार या संपादक पर किसी पत्रिका का विशेषांक आना अपने-आप में ही साहित्य जगत में उनकी व्यापक स्वीकार्यता को प्रदर्शित करता है
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