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स्वस्थ समाज के लिए अचूक नुस्खा
लेखक के अनुसार उसने फरवरी 2004 में यह उपन्यास लिखना शुरू किया। तब देश में दल विशेष का शासन भी ठीक बारह वर्ष तक 2015 में यह उपन्यास पाठकों के हाथ में आया। तब भी देश में वैसी बयार चल रही रही है, यानी रचना कर्म के लिए लेखक को विशेष प्रकार का राजनीतिक माहौल रास आता है। 2015 में ही उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया। यह स्पष्ट नहीं कि पद्म पुरस्कार के निर्णायकों ने यह उपन्यास पटकर उससे प्रभावित होकर पद्म पुरस्कार देने का निर्णय लिया है या यह उपन्यास अभी उनकी नजर से नहीं गुजरा। यदि यह उपन्यास पढऩे के बाद यह निर्णय लिया गया है तो इस उपन्यास की सार्थकता बढ़ जाती है।
डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय की इन आलोचना पंक्तियों में:- 'हम न मरब मारिबे संसारा।Ó और वहां 'हमÓ आत्मा हो जाती है, व्यंग्य में दर्शन! पाठक चकित! हंसी काफूर? वाणी ऐसी फक्कड़ संत की जो आत्मा, जीवन, मृत्यु, ईश्वर जैसे दार्शनिक प्रश्नों पर निहायत खिलंदड़े अंदाज में बयान देता है। चयन की इस प्रक्रिया पर मुग्ध हो जाना पड़ता है, जिसमें गहरी बात भी है और खेल भी है। इस रोचक पर परिवर्तन में दर्शन उमड़ता है।
उपन्यास का केन्द्रीय पात्र बब्बा। कैंसर का मरीज है। स्वयं निरक्षर भट्टाचार्य पर एमबीबीएस डॉक्टर को जिन्दगी के अर्थ समझाता है, फर्माबरदार डॉक्टर सिर झुका कर चुपचाप सुन लेता है: ''अच्छा डॉक्टर साहब, हमें बताओ तो कि स्थाई जिन्दगी आखिर होती क्या है बताओ तो। तुमने तो भईया इत्ती पढ़ाई की है। डॉक्टरी के मोटे-मोटे पोथे पढ़े हैं, पर कभी हम जैसा कोई मूर्ख तुम से पूछ बैठे कि बताओ कि जिन्दगी होती क्या है? तो क्या ठीक से बता बताओगेे? नहीं बता पाओगे न? जिन्दगी को समझ में लाने कोई किताब नहीं पढऩी पड़ती। वर्ना बैठे-बैठे तो तुम लाख पोथियां पढ़ डालो। तब भी जिन्दगी को कभी समझ न पाओगे। तो जिन्दगी क्या है हम बताएं? जिन्दगी स्साली बस सुख की निरन्तर तलाश है और सुख भैंचों कहीं होता नहीं। जिन्दगी सुख के पीछे मूर्खानन्दन वाली दौड़ है। अरे सुख नाम की कोई चीज जो रही होय तब तो मिले न! समझो सुख कहीं होती नहीं। डॉ. साहब, सच तो यह कि जिन्दगी में सब तरफ दुख ही दुख है... वह अपनी मूर्खता के कारण दुख को ही सुख समझे रहता है। सुख के लिए लपकते हो पर दुख के कांटे में बिंध जाते हो, बस जेई है सुख-दुख की कहानी।ÓÓ
सुख-दुख का भेद जानने के लिए सिद्धार्थ से बुद्ध बनने की प्रक्रिया में वर्षों लग गए। यह ज्ञान बिना सुख-दुख हो गया कि यह बात केवल एक मूर्ख ही दे सकता है, बुद्ध, महावीर, परमहंस के चक्कर में मत पड़ो। यह संकेत है, और अगर शुद्ध गालियों को इस परिभाषा से निरस्त कर दिया जाए बाकी बचता ही क्या है? लेखक ने बारह वर्ष की कठोर साधना के पश्चात कुछ न में से (शून्य) कुछ तलाश करने की कोशिश की और जो कुछ उसने आपके सामने परोसा वह कुछ भी नहीं यानि जहां से चले थे लौट कर वहीं पहुंच गए। कूड़ा बीनने वाले भी इस उम्मीद में जाते हैं कि कुछ न में से कुछ तलाश कर ही लेंगे, पर उनकी हालत भी अंतत: ज्ञान चतुर्वेदी की सी हालत होती है कि उसे संत महात्मा, पीर पैगम्बर, औलिया को छोड़कर जिन्होंने इसे परिभाषित करने के लिए वर्षों तप तपस्या की तो अपनी तरह वे सुख-दुख की परिभाषा कर पाए। ज्ञान ने बब्बा को स्थापित कर उसकी वाणी से जैसी-तैसी, दुख-सुख की पारिभाषा करवानी चाही।
''अरे डॉक्टर साहब, जिन्दगी गाली की मस्ती है। गाली व्यंग्य का चोखा है। गाली साहित्य का प्रसाद है, गाली पंचदेवता का आर्शीवाद है, गाली जीवन है, गाली संस्कृति है, सुन्दर सम्बोधन है, जिस पर कुछ मूर्ख लोग चिढ़ जाते हैं, गुस्सा हो जाते हैं।
हजारों वर्षों के सभ्यता के इतिहास में बब्बा जैसा न हुआ है और न आगे होगा। लेखक की इस अद्भुत सोच के लिए भी शायद उसे पद्मश्री से नवाजा गया है। संभव है आने वाले समय में यह महान कृति पाठ्यक्रम का अंग बने और विद्यार्थी इस नई भाषा शैली से लाभान्वित होकर विदेशों में इस संस्कृति का प्रचार करें। घर आए मेहमान से वह कहे-''भैया, अंकल बड़े दिनों में दिखाई दिए कहां मर गए थे?ÓÓ टीचर भैयों, ट्यूशन वालों को ज्यादा नम्बर देता है, वगैरा। समलैंगिकता को अभी तक अभद्र, असामाजिक, अवैधानिक माना गया था, कालांतर में दृष्टि बदली, भाषा भी गतिशील है। हो सकता है ज्ञान चतुर्वेदी की इस भाषा को मान्यता मिले। रुढिय़ां टूटे। अध्यापकों, अभिभावकों का भाषागत संस्कार पूरी तरह टूट जाए। एक सरकारी स्कूल के बाथरूम में कुछ इसी तरह का लिखा हुआ था, टीचर ने कक्षा में विद्यार्थियों से पूछा- 'यह किसने लिखा है?Ó एक सच्चा, पक्का विद्यार्थी तन कर खड़ा हो गया- 'मैंने लिखा है।Ó उसने सर कहकर संबोधन नहीं किया। अध्यापक ने कहा-' आगे से वर्तनी का ध्यान रखना।Ó विद्यार्थी खुश होकर बैठ गया, मिल गई न मान्यता।ÓÓ
बब्बा अपनी नंगी जुबान में बोलते हैं- ''अच्छा डॉक्टर साहब, तुम ये बताओ कि तुमाओ शादी ब्याओ भयो कि नहीं। चलो नहीं हुआ हो पर कभी स्त्री संसर्ग किए हो कि नहीं? शरमाओ मती, अरे आदमी भयो-पैदाइशी से स्त्री के पीछे भगा-भगा फिरता है। यही फितरत है आदमी की। जवान हुआ नहीं कि स्त्री संसर्ग के लिए कैसे मरा जाता है? देखा है न, लार बरसता खड़ा रहता है, हर स्त्री की राह में। बस सोचता है कि जो मिल जाए तो मजा आ जाए...।ÓÓ
उपरोक्त इबारत अगर, विद्याार्थियों को पढ़ाई जाए तो बलात्कार भी समस्या ही न रहे। डॉक्टरों को शरीर विज्ञान पढऩे, साहित्यकारों को श्रृंगार रस पढऩे, विधिवेत्ताओं को कानून पढऩे में सहायता मिले। परसाई क्या खाक ऐसा व्यंग्य लिख पाएंगे, वह कैसा-कैसा लिखते थे और फिर सरेआम पिटते थे फिर 'विकलांग श्रद्धा का दौरÓ लिखकर पब्लिक की सहानुभूति बटोरते थे। ज्ञान ने भला किया। व्यंग्य लेखकों का बड़ा-बड़ा सुगम, सरल और लोकप्रिय राजमार्ग है, किसी किस्म का कोई खतरा ही नहीं, न ही प्रतिबंध लगाने की मांग। हो सकता है इस उपन्यास पर भी फिल्म बन जाए, सैंसर बोर्ड तो अपने आदमी हैं, सरकार अपनी है, प्रांत को भी और केन्द्र को भी कोई बड़ा पुरस्कार भी मिल जाए।
पद्मश्री ज्ञान चतुर्वेदी की जगह-अगर ऐसी उपन्यास किसी ऐरे-गैरे ने लिखा होता तो पहले तो वह छपना ही नहीं था अगर दरीबेदर चावड़ी बाजार से कहीं छप भी जाता तो पटरी पर पीली पन्नियों को लपेट कर चोरी-छिपे बेचा जाता। पर यहां तो नाम की महिमा है। यह राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है और महान आयोजकों ने यत्र-तत्र सर्वत्र इसकी प्रशंसा के पुल बांधे हंै। यह अलग बात है कि पुलों में जल्दी दरार न आ जाए तब तक ज्ञान चतुर्वेदी को बधाई और शुभकामनाएं।
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