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विचारपुस्तक-जगत Alert Star Digital Team Sep 1, 2015 12:01 PM

उगा है फिर नया सूरज

उगा है फिर नया सूरज

उगा है फिर नया सूरज

पुस्तक समीक्षा
आज की गज़़ल के संदर्भ में मशहूर शायर बशीर ‘बद्र’ ने अपने एक महत्वपूर्ण साक्षात्कार में कहा है- ‘जो शब्द हमारी जि़न्दगी में घुलमिल गए हैं, गज़़ल की भाषा उन्हीं शब्दों से बनती है। हिन्दी गज़़ल के असर से उर्दू गज़़ल और उर्दू गज़़ल के असर से हिन्दी गज़़ल में बड़ी ख़ूबी आती जा रही है। मुझे वो गज़़ल ज़्यादा भरपूर लगती है जिसकी भाषा हिन्दी और उर्दू के फर्क़ को ख़त्म करती है।’ यह बात बिल्कुल सही है कि फ़ारसी की इज़ाफ़त वाली उर्दू में कही गई गज़़ल हो या तत्सम मिश्रित शब्दावली वाली हिन्दी की गज़़ल, आज की आम बोलचाल की भाषा में कही गई गज़़ल की तुलना में कहीं पीछे छूट गई है। दरअस्ल गज़़ल एक मुश्किल काव्य विधा है जिसमें छंद का अनुशासन भी ज़रूरी है और कहन का सलीक़ा भी। इसे इशारे को आर्ट भी कहा गया है। जिगर की धरती मुरादाबाद से भी कई रचनाकार आम बोलचाल की भाषा में बेहद शानदार गज़़लें कहते हुए शहर में भी और शहर से बाहर भी अप्रत्याशित लोकप्रियता अर्जित कर रहे हैं। गज़़ल के ऐसे महत्वपूर्ण रचनाकारों की अग्रिम पंक्ति में अपनी उपस्थिति मज़बूती से दजऱ् कराने वाले शायर डॉ. कृष्ण कुमार ‘नाज़’ के सद्य: प्रकाशित गज़़ल-संग्रह ‘उगा है फिर नया सूरज’ के अश्’आर पाठक के मन-मस्तिष्क पर अपनी आहट से ऐसी अमिट छाप छोड़ जाते हैं जिनकी अनुगूंज काफी समय तक मन को झकझोरती रहती है। इस संग्रह की गज़़लों में फलसफा है, मश्विश्रे हैं, फिक़्र-ओ-फऩ है और एक अलग तरह की मिठास भी है, एक गज़़ल के शे’र मुलाहिजा हों-
‘शाम का वक़्त है शाखों को हिलाता क्यों है
 तू थके-मांदे परिन्दों को उड़ाता क्यों है
 भूल मत तेरी भी औलाद बड़ी होगी कभी
 तू बुज़ुर्गों को खरी-खोटी सुनाता क्यों है’

हालांकि गज़़ल का परंपरागत स्वर शृंगारिक ही है लेकिन आज कही जा रही गज़़ल आम आदमी की बात करती है, उसकी चिन्ताओं पर चिंतन करती है, समस्याओं के हल सुझाती है और बिद्रूपताओं पर कटाक्ष भी करती है। डॉ. नाज़ की गज़़लें भी आम आदमी की तकलीफ़ को बड़ी ही शिद्दत और संवेदनशीलता के साथ उजागर करती हैं-
‘अब किसी घर में न खिडक़ी है, न रोशनदान है
 देखिए कितना डरा-सहमा हुआ इंसान है
 फ़ासला कितना है पीठ और पेट में मुझसे न पूछ
 मेरे घुटनों को मगर इसकी बहुत पहचान है’

आज के इस संवेदनहीन समाज में चारों ओर भयावह वातावरण उपस्थित है। अमानवीयता और स्वार्थी प्रवृत्तियां चप्पे-चप्पे पर मौजूद हैं और बाज़ार हर जगह हावी है घर के भीतर भी और बाहर भी। वर्ष 2012 में अपने काव्यगुरू स्व. कृष्णबिहारी ‘नूर’ की रचनाधर्मिता पर महत्वपूर्ण शोध करने वाले और समाजशास्त्र, उर्दू व हिन्दी विषय में स्नातकोत्तर नाज़ जी की गज़़लों में ख़ूबसूरती के साथ कहे गए उनके शे’र हालाते-हाजिऱा पर तज़किरा भी करते हैं-
‘नई तहज़ीब को अपना सभी कुछ मान लेता है
 मेरा बेटा मुझी पे आज मुठ्ठी तान लेता है’
या फिर
‘ज़ह्न से उलझा हुआ है मुद्दतों से यह सवाल
आदमी सामान है या आदमी बाज़ार है’

आजकल समकालीन कविता को लेकर जगह-जगह अनेक विमर्श आयोजित होते हैं, लम्बे-चौड़े वक्तव्य दिए जाते हैं और अंतत: ‘समकालीन कविता में यथार्थवाद’ के संदर्भ में छान्दसिक कविता को नजऱअंदाज़ करते हुए नई कविता के सिर पर सच्ची समकालीन कविता का ताज रख दिया जाता है। मेरा मानना है कि कविता का फार्मेट चाहे जो हो, रचनाधर्मिता जब अपने समकालीन सन्दर्भों पर विमर्श करती है तो वह विमर्श महत्वपूर्ण तो होता ही है दस्तावेज़ी भी होता है। शहर मुरादाबाद दुनिया भर में पीतलनगरी के रूप में विख्यात है, इसे पीतलनगरी बनाने में उन लोगों की कारीगरी की बहुत बड़ी भूमिका है जिनकी तमाम जि़न्दगी पीतल की भट्टियों से निकलने वाले धुंए में ही खप जाती है और निर्मित पीतल उत्पादों की चमक में पीड़ा खोकर रह जाती है। डा. नाज़ की शायरी पीतल कारीगरों की पीड़ा की आवाज़ बनती है-
‘तरफ़दारी नहीं करते कभी हम उन मकानों की
छतें जिनकी हिमायत चाहती हों आसमानों की
मुरादाबाद में कारीगरी ढोता हुआ बचपन
लिए फिरता है सांसों में सियाही कारखानों की’

‘उगा है फिर नया सूरज’ की गज़़लों से गुजऱते हुए मुझे एक विशेषता महसूस हुई डॉ. नाज़ की शायरी में, उनके अश्’आर जीवन-जगत में आसपास घटती घटनाओं, घर के आंगन की मिठास के साथ-साथ दिन-प्रतिदिन होते कसैले अनुभवों के कारण कथ्य में ताजग़ी और गज़़लियत से भरपूर होते हैं। एक वेतनभोगी व्यक्ति के अहसास को, उसकी कृत्रिम व क्षणिक खुशियों के भ्रम को और उसकी विवशताओं को कितनी खूबसूरती के साथ डॉ. नाज़ अपनी शायरी में पिरोते हैं-
‘बाद तुम्हारे सब अपनों के मनमाने व्यवहार हुए
मुस्कानें ही क्या, आंसू भी सालाना त्योहार हुए
घर में सबकी अपनी ख़्वाहिश, सबकी अपनी फऱमाइश
आज हमें तनख़्वाह मिली है, हम भी इज़्ज़तदार हुए
सबकी नजऱों में तो अपने घर के मुखिया हैं अब भी
लेकिन बच्चों की नजऱों में हम बासी अख़बार हुए’

डॉ. नाज़ की शायरी में विभिन्न रंगों के चित्र मिलते हैं, कभी वह समसामयिक विद्रूपताओं को अपनी शायरी का मौज़ू बनाते हैं तो कभी फलसफ़े उनके शे’रों की अहमियत को ऊचाईयों तक ले जाते हैं। लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचकर जब कोई व्यक्ति गुमनामी के रसातल में पहुंचता है तो अवसाद उसे अपने शिकंजे में कस लेता है। ऐसे व्यक्ति की मनोदशा को अपने शे’रों में कुछ इस तरह से पेश करते हैं डॉ. नाज़-
‘बुलंदी शोहरतों की आदमी को जब गिराती है
 तो गुमनामी की बैसाखी उसे चलना सिखाती है
वो मंदिर हो कि मस्जिद हो, वो गिरिजा हो कि गुरुद्वारा
इबादतगाह कब अपने लिए लडऩा सिखाती है’

उर्दू के मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली ने कहा है- ‘गज़़ल मीनाकारी की कला है जिसमें केवल शब्दों से ही नहीं, शब्दों में शामिल अक्षरों की ध्वनियां, काफियों की ताल, छंद की चाल के माध्यम से भी बात की जाती है। यह एक ऐसी विधा है जो खामोशियों की जुबान में बोलती है और फिक़्र को जज्बे की तराजू में तोलती है।’ निश्चित रूप से नाज़ जी की गज़़लों को पढक़र-सुनकर जि़न्दगी की बारीकियों को समझा जा सकता है, वह अपनी आंखों से दुनिया को देखते हैं फिर अपने तज़्रबे को गज़़ल की शक्ल में ढालते हैं। उनकी एक गज़़ल के बेहद ख़ूबसूरत शे’र मुलाहिजा हों-
‘ग़म के कागज़़ पर ख़ुशी के दस्तख़त अपनी जगह
और जिद्दी आंसुओं की सल्तनत अपनी जगह
हम तो क़तरा हैं ज़माने के समंदर में मगर
बावजूद इसके हमारी अहमियत अपनी जगह
मैंने दुश्मन को भी ख़ुश होके लगाया है गले
दुश्मनी अपनी जगह, इंसानियत अपनी जगह’

‘उगा है फिर नया सूरज’ से पहले भी नाज़ जी की गज़़लों के दो संग्रह- ‘इक्कीसवीं सदी के लिए’ और ‘गुनगुनी धूप’ शीर्षक से प्रकाशित होकर साहित्य-जगत में पर्याप्त चर्चित हो चुके हैं। शायरी के क्षेत्र में अपनी अंतर्राष्ट्रीय अदबी पहचान रखने वाले एवं ख़ुशबूदार गज़़लें कहने में सिद्धहस्त डॉ. कृष्ण कुमार ‘नाज़’ का यह गज़़ल-संग्रह अपनी अहमियत की एक नई इबारत लिखेगा साहित्य-जगत में, मुझे पूरी उम्मीद है। आमीन।

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एलर्ट स्टार नाम की पत्रिका और फिर समाचार-पत्र का जन्म हुआ। हमारा प्रयास कि हम निष्पक्ष और निडर पत्रकारिता का वह स्वरूप अपने पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करे। जो लोगो के मन मस्तिष्क में एक भरोसे के रूप में काबिज हो।

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