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अब अफसर भी समझेंगे सरकारी शिक्षा का दर्द
प्राथमिक शिक्षा में सुधार जरूरी
एक याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह आदेश दिया है कि सभी जनप्रतिनिधियों, सरकारी अफसरों एवं कर्मचारियों तथा जजों को भी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में ही पढऩे के लिए भेजना होगा। हाईकोर्ट के मुताबिक, यदि सरकारी कर्मचारियों ने अपने बच्चों को कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ाया तो उन्हें फीस के बराबर की रकम हर महीने सरकारी खजाने में जमा करानी होगी। हाईकोर्ट के इस आदेश की जितनी भी सराहना की जाए वह कम है क्योंकि इस आदेश के अनुपालन के बाद निश्चित रूप से सरकारी स्कूलों की दयनीय दुर्दशा सुधरेगी। सर्वशिक्षा अभियान और फिर शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद भी सरकारी स्कूलों की शिक्षा के स्तर में सुधार के कोई लक्षण न•ार नहीं आ रहे हैं। इसकी पुष्टि समय-समय पर आने वाली शिक्षा से सम्बन्धित विभिन्न रिपोर्टें करती रहती हैं। शिक्षा के सम्बन्ध में देशव्यापी पड़ताल करने वाली गैर सरकारी संगठन 'असरÓ (एनुअल स्टेटस आफ एजुकेशन रिपोर्ट) की हालिया रिपोर्ट बताती है कि सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले पांचवीं स्तर के केवल 48.1 फीसदी विद्यार्थी और आठवीं स्तर के केवल 75 फीसदी विद्यार्थी ही कक्षा दो की किताबें पढ़ पाते हैं। शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद से स्कूली बच्चों के नामांकन में खासा वृद्धि हुई है, परन्तु सरकारी स्कूलों की तुलना में प्राइवेट स्कूलों में बच्चों का नामांकन लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 2013 में जहां 49 फीसदी बच्चे निजी स्कूलों में जा रहे थे। वहीं 2014 में इनकी संख्या बढ़ कर 51.7 फीसदी हो गयी है। हिन्दी क्षेत्रों से जुड़े स्कूलों की स्थिति तो और भी अधिक चिन्ताजनक है। उत्तर प्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, जम्मू कश्मीर, उत्तराखण्ड जैसे राज्यों में निजी स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या में 35 से 40 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है। यदि दक्षिण के कुछ राज्यों को छोड़ दिया जाय तो अन्य सभी राज्यों में सरकारी स्कूलों की दशा निराशाजनक है। ग्रामीण क्षेत्रों के भी अभिभावक सरकारी की जगह निजी स्कूलों को ज्यादा तवज्जो दे रहेे हैं; क्योंकि उनका मानना है कि प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई अच्छी होती है। इस बदहाली के लिए सरकारी नियम और कानून ही जिम्मेदार है। उत्तर प्रदेश और बिहार में जिस प्रकार अध्यापकों की भर्ती की गयी है और उसमें स्थानीय जोड़ तोड़ हुई है, उससे वे अच्छे लोग किनारे कर दिए गए, जो अपने ज्ञान और समझ के जरिए स्कूली शिक्षा में सार्थक हस्तक्षेप कर सकते थे। शिक्षा मित्र योजना के तहत भर्ती का अधिकार जब से पंचायतों के हवाले किया गया है, उसमें सिर्फ और सिर्फ जोड़-तोड़ को ही बढ़ावा मिला है। पंचायतों ने योग्यता के मानदंड के बजाय अपने गु्रप और रिश्वत को ज्यादा महत्व दिया है।
उत्तर भारत के राज्यों में पंचायती राज व्यवस्था में नगालैण्ड की तरह परिपक्वता नहीं आ पाई है, जहां पंचायती राज बेहतर शिक्षा को भावी पीढ़ी के लिए जरूरी मानती है तथा बेहतर शिक्षक की नियुक्ति एवं पढ़ाने की शैली के साथ -साथ अनुशासन पर भी जोर देती है। यही वजह है कि पिछले कुछ सालों से नगालैण्ड में निजी स्कूलों के भी बच्चे सरकारी स्कूलों की तरफ आ रहे हैं। लेकिन उत्तर भारत में हालात बिल्कुल उलट है। उत्तर भारत के सरकारी स्कूलों की खस्ता हालत की वजह भर्ती की प्रक्रिया और स्कूली शिक्षा पर पंचायतों का प्रभुत्व को माना जाता है। केन्द्र सरकार ने स्कूली शिक्षा की बदतर स्थिति को देखते हुए राज्य सरकारों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया और उन्हें कड़े मानदंड अपनाने की हिदायत दी। लेकिन हकीकत तो यह है कि वर्तमान में जिस तरह से निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है उससे सरकारी शिक्षा व्यवस्था को किनारे होना ही है। सरकारी शिक्षा को लेकर आमजन के मन में जो छवि बनी हुई है, उससे कोई भी अपने बच्चे को सरकारी स्कूलों में नहीं भेजना चाहता और जो भेजते भी हैं वे ट्यूशन का सहारा ले रहे हंै। भारत देश उदारीकरण का एक दौर पूरा कर चुका है और अब इसमें आगे बढऩे के गुंजाइश तभी होगी, जब हम ज्ञान और समझ आधारित समाज की तरफ आगे बढेंग़े। अगर स्कूली शिक्षा का आधार यही बना रहा तो यह निश्चित ही सम्भव नहीं होगा। यह किसी हद तक सही है कि शिक्षा के ढांचे को सुधारने की जिम्मेदारी राज्यों की ही है परन्तु देखने में आया है कि शिक्षा के अधिकार कानून के प्रभावी होने के तकरीबन 3 से अधिक साल बाद भी राज्य सरकारें गम्भीर नहीं हैं। राज्यों में लाखों-लाखों की संख्या में शिक्षकों के पद आज भी रिक्त पड़े हैं। ऐसी परिस्थितियों में देश की प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता का अनुमान स्वत: ही लगाया जा सकता है।
देश में प्राथमिक शिक्षा की बढ़ी मांग के अनुरूप अनुमानित बजट का जो प्रावधान किया जाता है वह निश्चित ही इतना कम होता है कि राज्य सरकारें सदैव ही बजट की कमी बताते हुए अल्प वेतन अथवा ठेके पर शिक्षा कर्मियों की भर्ती करके प्राथमिक शिक्षण की खानापूर्ति करती है। देश की आ•ाादी के बाद राष्ट्रीय विकास के लिए जिस विदेशी माडल का अनुकरण किया गया, उसने हमारी मातृभाषा से जुड़ी प्राथमिक शिक्षा की पृष्ठभूमि को गर्त में धकेल दिया। आज मैकाले शिक्षा पद्धति से जुड़ी अंग्रेजी शिक्षा आत्मसम्मान का साधन बन गई। पहले तो राज्यों में केवल सरकारी स्कूल ही हुआ करते थे और उनमें से निकले बच्चे प्रत्येक क्षेत्रों में सफलता का परचम लहराते थे। यह कहना गलत होगा कि पढ़ाई का स्तर केवल प्राइवेट स्कूलों में ही रह गया है, सरकारी स्कूल नकारा हो गये हैं। यदि सरकार ध्यान दे और शिक्षकों का सही ढंग से चयन करें तो वर्तमान स्थिति को निश्चित ही सुधारा जा सकता है। देश में शिक्षा की सूरत में सुधार के लिए जितनी भी कवायदें की गईं, उनमें सबसे ज्यादा जोर दाखिलों पर दिया गया और इसके लिए विशेष अभियान भी चलाये गए। इस सच से इन्कार नहीं किया जा सकता कि मध्यान्ह भोजन, यूनिफॉर्म, साइकिल, छात्रवृति के लालच से सरकारी स्कूलों में प्रवेश बढ़े हैं। यहां सवाल यह उठता है कि क्या प्राथमिक शिक्षा का उद्देश्य मात्र स्कूलों में प्रवेश वृद्धि तक ही सीमित रहना चाहिए? देश की प्राथमिक शिक्षा में योग्य व प्रतिबद्ध शिक्षकों और इसके बुनयादी तंत्र को श्रेष्ठता के आधार पर विकसित करने की जरूरत है। इसके अलावा पाठ्यक्रम तथा उसे बच्चे के व्यक्तित्व और देश के सुभाव के अनुरूप बनाने के साथ-साथ सड़ी-गली सरकारी बुनियादी शिक्षा में नवीनता के साथ में बड़े परिर्वतन के लाने की भी खासी आवश्यकता है।
प्राथमिक शिक्षा देश की रीढ़ है, माध्यमिक शिक्षा उस विकास की रीढ़ को स्तंभित करने का माध्यम है और उच्च शिक्षा राष्ट्र के विकास को उत्कृष्टता के ओर ले जाने वाली संस्था है। उच्च शिक्षा के स्तर में भी भारत की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। आखिर प्राथमिक शिक्षा के बगैर सुधरे उच्च शिक्षा की स्थिति अच्छी कैसे हो सकती है? देश के सरकारी स्कूलों से पब्लिक स्कूलों में बच्चों का लगातार बढ़ता पलायन तथा ट्यूशन की बढ़ती प्रवृति बुनियादी शिक्षा को कमजोर बना रही है। सरकारी स्कूलों का तो हाल यह है कि पांचवी कक्षा में पढऩे वाला छात्र दूसरी कक्षा की किताबें भी ठीक से नहीं पढ़ पाता है। केन्द्र एवं राज्य सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद भी शिक्षा की गुणवत्ता में कोई भी सुधार नहीं आया है। सवाल यह है कि ऐसी स्थिति में शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने के लिए क्या किया जाय? शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने के लिए सबसे पहले प्रारम्भिक शिक्षा के मुख्य घटक-विद्यार्थी, विद्यालय, अध्यापक एवं शिक्षा प्रबंध प्रणाली को समझना चाहिए। शिक्षा प्रबंध प्रणाली शिक्षा के विभिन्न नीतियों और कार्यक्रमों को संचालित करती है। गुणवत्ता के लिए इन सभी घटकों पर समग्र रूप से प्रयास करने होंगे। इसमें सबसे महत्वपूर्ण घटक है शिक्षा प्रबंध प्रणाली, चूंकि यह शिक्षा की संरचना (विद्यालय ) एवं मानव संसाधन (विद्यार्थी, शिक्षक) पर सीधा प्रभाव डालती है। प्रबंध प्रणाली का रोल विद्यालयों के निरीक्षण एवं पर्यवेक्षण में भी महत्वपूर्ण है। प्राय: यह देखा गया है कि विद्यालयों में कोई अधिकारी वर्ष में एक बार भी निरीक्षण के लिए नहीं जाता है। एक अन्य एवं महत्वपूर्ण आयाम अकादमिक सपोर्ट का होता है, जहां शिक्षक को सीखने-सिखाने के विभिन्न अभिनव प्रयोगों से अवगत कराया जाता है। यह प्रयोग विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर बनाये जाते हैं, जिससे पढऩे-सीखने की प्रक्रिया त्वरित एवं प्रभावी हो सके। दुर्भाग्यवश इन सभी आयामों पर हमारी शिक्षा प्रणाली कमजोर साबित हुई है और इसी कारण हम गुणवत्ता में पिछड़े हुए हैं। अगर हमें शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाना है तो अपने शिक्षा प्रबंध को प्रभावी बनाना होगा। इसमें जिले के कलेक्टर, जिला शिक्षाधिकारी एवं जनप्रतिनिधियों को भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करना होगा। अक्सर यह देखा गया है कि जहां ये लोग शिक्षा संबंधी कार्यक्रमों में रुचि लेते हैं, वहां शिक्षा का स्तर काफी हद तक अच्छा है। इसके साथ ही रिक्त स्थानों पर अध्यापकों की नियुक्ति एवं उनके सतत् प्रशिक्षण की व्यवस्था करनी होगी। शिक्षा को रुचिकर बनाने के लिए शिक्षा सामग्री एवं नवीनतम पाठ्यक्रम को तैयार करना होगा। अब वह समय आ गया है, जब शिक्षा के कार्यक्रमों का फोकस आधारभूत सुविधाओं के आगे गुणवत्ता पर किया जाय।
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