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प्राथमिक शिक्षा की चिंताजनक तस्वीर
देश के 30 फीसदी से अधिक विद्यालयों में पेयजल व शौचालय की व्यवस्था नहीं
पिछले दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला देते हुए कहा था कि यूपी के सभी जनप्रतिनिधियों, सरकारी अफसरों, कर्मचारियों और जजों को अपने बच्चों को सरकारी प्राइमरी स्कूलों में पढ़ाना होगा। इस बड़े और ऐतिहासिक फैसले के बाद उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में पिटीशन दायर करने वाले अध्यापक को ही राज्य सरकार ने बर्खास्त कर दिया है। क्योंकि शिव कुमार की पीआईएल पर ही हाईकोर्ट ने इतना बड़ा फैसला दिया था। यह इस देश की बिडम्बना है कि जब आप सही काम करते हंै, सही कहते हंै तो सिस्टम आपको काम नहीं करने देता है और आपको बर्खास्त कर दिया जाता है। शिव कुमार के साथ कुछ नया नहीं हुआ बल्कि वही हुआ जो इस देश का सिस्टम हर ईमानदार प्रयास करने वाले आदमी के साथ करता है। लेकिन हाईकोर्ट के इस फैसले के बड़े दूरगामी परिणाम हो सकते है क्योंकि राजतंत्र की तरह ही लोकतंत्र में भी शासक और शोषित दो वर्ग बन गए हैं । देश में आर्थिक उदारीकरण के बाद एक वर्ग का जबर्दस्त विकास हुआ है जबकि दूसरा वर्ग पिछड़ता गया और करोड़ों नागरिको को अपनी बुनियादी और मूलभूत जरूरतों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। आज भी सबके लिए बेहतर शिक्षा उपलब्ध नहीं है । देश में खासकर ग्रामीण भारत में प्राथमिक शिक्षा के हालात बहुत ही खऱाब स्थिति में है। प्राइमरी विद्यालयों में शिक्षा का स्तर इतनी ज्यादा खऱाब है कि कोई भी थोड़ा सा साधन संपन्न व्यक्ति भी अपने बच्चे को यहाँ नहीं पढ़ाना चाहता। वो किसी तरह से खुद इंतजाम करके या कर्ज लेकर बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाना चाहता है। देश के राजनेता, सांसद, विधायक, मंत्री अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ाते, ना ही कभी पढ़ाना चाहते। क्योंकि सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर ठीक नहीं है या यूं कहें कि आजादी के बाद से अब तक इसे ठीक करनें के प्रयास ठोस ढंग से नहीं किये गए। यह भी एक सच्चाई है कि जिस दिन से देश का शासक वर्ग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढऩे को भेजेगा उसी दिन से यहाँ शिक्षा का स्तर ठीक होने लगेगा। अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस पर अपना निर्णय दिया है तो एक सकारात्मक उम्मीद बंधती है कि कुछ ठीक होगा लेकिन इस फैसले पर कभी अमल हो पायेगा इसकी उम्मीद कम ही नजर आती है क्योंकि राज्य सरकार द्वारा शिव कुमार की बर्खास्तगी के तेवर देखते हुए स्पष्ट रूप से समझ में आ रहा है कि सरकारें वास्तविक सुधार नहीं चाहती क्योंकि अगर चाहती होती तो हाईकोर्ट के फैसले के एक दिन बाद ही हाईकोर्ट में पिटीशन दायर करने वाले अध्यापक को बर्खास्त नहीं कर दिया जाता। कुल मिलाकर राजनीति जैसी दिखती है वैसी बिलकुल नहीं होती, कम से कम जनहितकारी तो नहीं ही होती , राजनीति का सीधा सा सिद्धांत है की पहले पूंजीपतियों और अपने आकाओं का पेट भरों,उनके हितों में निर्णय लो इसके बाद अगर कोई गुंजाइश बनती है तब जनता की तरफ देखों और उनके लिए काम करों।
सिर्फ उत्तरप्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति बेहद चिंताजनक है। स्वयंसेवी संगठन प्रथम की प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर एक रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के 6 साल बाद भी प्राथमिक शिक्षा के स्तर में कोई परिवर्तन नजर नहीं आता हैं बल्कि साल दर साल स्थिति और भी बदतर होती जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण विद्यालयों में कक्षा पॉच के विद्यार्थीं न तो गणित का साधारण सा जोड़-घटाना कर सकते हैं और न ही मात्र भाषा में लिख पढ़ पाते हैं। सर्वशिक्षा अभियान के लिए हजारों करोड़ के बजट के बावजूद देशभर में सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी है कहीं कही तो 200 बच्चों पर 1 शिक्षक ही तैनात है और कहीं-कहीं तो पूरा का पूरा विद्यालय शिक्षामित्र के सहारे ही चलता है। देश में इस समय तकरीबन 13.62 लाख प्राथमिक विद्यालय हैं। परन्तु इनमें कुल 41 लाख शिक्षक ही तैनात हैं,जबकि देश में अनुमानित 19.88 करोड़ बच्चे प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ रहे हैं। साथ ही पूरे देश में करीब 1.5 लाख विद्यालयों में 12 लाख से भी ज्यादा पद खाली पड़े हैं। प्रतिभाशाली शिक्षकों के अभाव का ही परिणाम है कि उत्तरप्रदेश सहित कई प्रदेशों के बच्चों के सीखने,पढऩे व समझने के स्तर में बराबर गिरावट हो रही है।
एक तरफ देश के प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है वही दूसरी तरफ जो शिक्षक फि़लहाल विद्यालयों में तैनात है उनसे भी सरकारें कई तरह के काम करवाती हंै जिससे उनका पूरा ध्यान बच्चों को पढ़ाने में नहीं रह पाता। शिक्षकों से वोटर लिस्ट का काम,जनगणना कार्य ,पल्स पोलियो दवा पिलवाना,चुनाव डयूटी करना जैसे अनेकों काम करवाए जाते हैं साथ में मिड डे मील योजना के लिए मध्याह्न भोजन कैसे बनना है,उसके लिए सब्जी लाना,गैस-तेल-लकड़ी-कंडे का इंतजाम भी कराना पड़ता है। ऐसे में आप उनसे शिक्षा में गुणवत्ता की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। साल 2014-15 में सर्व शिक्षा अभियान के लिए 28, 635 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे। 2015-16 के बजट में 22,000 करोड़ रुपए आवंटित किए गए है। लेकिन इस बजट का अधिकांश हिस्सा भ्रष्टाचार की भेट चढ़ जाता है और प्राथमिक स्कूलों में बच्चों को बुनियादी और मूलभूत सुविधाएँ नहीं मिल पाती है। यूनीसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार देश के 30 फीसदी से अधिक विद्यालयों में पेयजल की व्यवस्था ही नहीं है और 30 प्रतिशत विद्यालयों में लड़कियों के लिए शौचालय नहीं हैं साथ ही 40 से 60 फीसदी विद्यालयों में खेल के मैदान तक नहीं हैं। देश में अब भी लगभग 1800 से अधिक स्कूल टेंट और पेड़ों के नीचे चल रहे हैं। 24 हजार विद्यालयों में पक्के भवन नहीं हैं, जो बच्चे पढऩे के लिए आते भी हैं वे घर से 'बोरी या टाट पट्टीÓ लेकर आते हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि हमारे देश के प्राथमिक विद्यालयों का स्तर क्या है और ऐसे में किन परिस्थितियों में पढ़ाई होती होगी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय के बाद जिस तरह से उत्तरप्रदेश की सपा सरकार ने शिव कुमार को बर्खास्त किया वो बेहद शर्मनाक है साथ में न्याय व्यवस्था को मुंह भी चिढ़ा रहा है ऐसे में कोर्ट और केंद्र सरकार दोनों को इस मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए शिव कुमार को बहाल कराना होगा तभी जनता में इस फैसले के लागू होने पर एक विश्वास बन पायेगा । इसके साथ ही देश भर में प्राथमिक शिक्षा के सुधार के लिए बहुत ठोस कदम उठाये जाने की जरुरत है इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय अपने आप में बहुत ऐतिहासिक कदम है जिसे पूरे देश में लागू किये जाने की जरुरत है। केंद्र सरकार को इसके लिए बाकायदा एक कानून बनाना चाहिए जिससे सरकारी अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों व राजकीय सहायता ले रहे लोगों के बच्चों को प्राथमिक स्कूलों में पढऩा अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए .इस कदम से ही देश में प्राथमिक शिक्षा की तस्वीर अच्छी हो सकती है ।
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