होम गुजरात यह तो होना ही था!
गुजरात यह तो होना ही था!
''स्थिति को नियंत्रण में लेेने हेतु हमने सेना को बुलाया है। ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस के खिलाफ गुस्सा था। ऐसे में हमने सामान्य स्थिति बहाल करने के हेतु तटस्थ बल तैनात करने का निर्णय लिया। -जी.आर. अलोरिया, मुख्य सचिव, गुजरात :- गोधरा (गुजरात) दंगों के करीब 13 वर्ष पश्चात गुजरात के अधिकांश हिस्सों में एक बार पुन: सेना और अर्धसैन्य बलों की तैनाती हो गई है। गुजरात के पटेल समुदाय द्वारा किए प्रदर्शन के बाद राज्य के मुख्य सचिव द्वारा ''तटस्थ बलÓÓ की नियुक्ति की स्वीकारोक्ति से स्पष्ट हो गया है कि राज्य का पुलिस बल पूर्वाग्रहग्रस्त है। याद करिए गुजरात दंगों के दौरान अहमदाबाद के तत्कालीन पुलिस प्रमुख पी.सी. पांडे ने कहा था, ''पुलिस सामान्य सामाजिक वातावरण से पृथक नहीं है। जब कभी भी समाज के परिप्रेक्ष्य में परिवर्तन होता है तो पुलिस भी उसका हिस्सा होती है, और उसके कुछ संक्रामक प्रभाव उस पर अवश्य ही पड़ेंगे।ÓÓ (दि टेलीग्राफ-2 मार्च 2002)। जाहिर है जिस मानसिकता के साथ राज्य प्रशासनतंत्र को पाला-पोसा गया, यह उसी का परिणाम है कि राज्य में पलक झपकते ही सेना को बुलाना पड़ा। अतएव प्रशासन को लोकतांत्रिक व संवेदनशील बनाना ही होगा। हार्दिक पटेल की पाटीदार अनामत (आरक्षण) आंदोलन समिति की अहमदाबाद रैली में 10 लाख से ज्यादा की भीड़ साफ समझा रही है कि स्थितियां बेकाबू हैं। शासन करने वाले घमंड से इतने चूर हैं कि वह इसी संगठन द्वारा 17 अगस्त को सूरत में हुई रैली जिसमें साढ़े चार लाख से ज्यादा पाटीदारों/पटेलों ने शिरकत की थी, से सबक लेने को तैयार नहीं थे। इसके अलावा 6 जुलाई से अब तक (48 दिनों में) राज्य में आरक्षण के समर्थन में 190 रैलियां निकली हैं। इसमें से 140 पटेल समुदाय एवं 55 रैलियां ब्राह्मण, क्षत्रिय, सोनी व लाहोना समुदायों ने निकाली हैं। याद करिए, नरेंद्र मोदी की साढ़े छह करोड़ गुजरातियों की अस्मिता की ललकार भी कभी इतनी भीड़ या जनसैलाब को इक_ा करने में सफल नहीं हो पाई थी। तो फिर ऐसा क्या हो गया जो कि एक बाईस वर्षीय नवयुवक का आह्वान पिछली एक शताब्दी में भारत में होने वाली सबसे विशाल रैलियों में से एक में परिवर्तित हो गया और इस कल्पनातीत रैली को आकार दिया। क्या इसे मिस्र के तहरीर चौक के जमावड़े यानि अरब स्प्रिंग से प्रभावित कहा जा सकता है या यह हांगकांग के 18 वर्षीय युवक जोशुआ वांग, जिसे ''राष्ट्र का उद्धारकÓÓ घोषित किया गया था, से प्रभावित माना जा सकता है? यह रैली स्पष्टतया उपरोक्त में, किसी से प्रभावित नहीं है। पीछे मुड़कर देखने से पता चलता है कि पिछले कुछ वर्षों मेें शासक वर्ग जैसी जातियों ने ओबीसी में आरक्षण की मांग की है। इसमें जाट प्रमुख हैं। यह जाति पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तरप्रदेश की सर्वाधिक शक्तिशाली व प्रभावशाली जाति रही है। पंजाब में तो यह मुहावरा प्रचलित था कि, ''ऊपर रब्ब ते नीचे जट्ट (जाट)ÓÓ। ऐसी ही दूसरी प्रभुत्वशाली जाति राजस्थान के गुर्जर हैं। इनका भी राजस्थान व अनेक राज्यों में बड़ा दबदबा है। अब यदि पटेलों की बात करें तो यह गुजरात की कुल आबादी का 12 प्रतिशत हैं। इस समुदाय के चार व्यक्ति बाबूभाई पटेल, चिमनभाई पटेल, केशुभाई पटेल और वर्तमान में आनंदीबेन पटेल गुजरात के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। वल्लभभाई पटेल के प्रभाव से हम सभी परिचित हैं। गुजरात के वर्तमान मंत्रिमंडल में प्रमुख मंत्री पद पटेलों के पास हैं। 40 से ज्यादा विधायक पटेल हैं। अमेरिका के अधिकांश मोटल वगैरह पटेल समुदाय के हैं। भारत से सबसे पहले अफ्रीका, इंग्लैंड एवं अमेरिका पटेल ही गए हैं। तो फिर ऐसा क्या हो गया कि गुजरात के पटेल समुदाय को ''क्रांति रैलीÓÓ निकालनी पड़ी और धमकी देना पड़ी कि यदि आरक्षण संबंधी उनकी मांग नहीं मानी गई तो सन् 2017 के गुजरात विधानसभा चुनावों में कमल नहीं खिलेगा। इन तमाम सवालों के बीच में ही कहीं इसका उत्तर भी छिपा है। गौरतलब है पटेल मूलत: कृषक समुदाय है। इसके कुछ सदस्य सर्वप्रथम शहरों की ओर आए और समृद्ध बन गए। इसके परिणामस्वरूप यह धारणा पैठ बनाती गई कि यह पूरा समुदाय ही अत्यंत समृद्ध है। एक समय था जब राष्ट्रीय आय में खेती किसानी का योगदान 40 से 45 प्रतिशत के बीच होता था। अब वह घटकर 15 प्रतिशत पर आ गया है। खेती में लगातार नुकसान हो रहा है। यदि गुजरात की ही बात करें तो पिछले तीन वर्षों से खेती लगातार खराब हो रही है और किसान परेशान हैं। सरकार लगातार अनदेखी कर रही है और इस वजह से नई पीढ़ी के पास गांव में रहने का कोई कारण नहीं है। दूसरी ओर, भारत की सारी योजनाएं शहर केंद्रित हो गई हैं या हमने शहर केंद्रित विकास को पूरी तरह से अपना लिया। गुजरात के पटेल या उत्तरभारत के जाट या राजस्थान के गुर्जर कृषि आधारित समुदाय ही हैं। गुजरात पर लौटते हैं। यहां जिस तरह के विकास मॉडल की मार्केटिंग की गई है उसमें सिर्फ उद्योग ही उद्योग दिखाई पड़ते हैं। चूंकि गांव में पैसा नहीं है और शहर में काम नहीं मिलता इसलिए पटेलों ने सोचा कि अमेरिका की ओर कूच करें। लाखों रुपए लगाकर छात्र वीजा पर विदेश गए, लेकिन वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण वहां भी ठीक रोजगार नहीं मिला और कर्जे का भारी भरकम बोझ लेकर वापस भारत लौट आए। ऐसे तमाम नवयुवक जिनके लिए गांव में अवसर नहीं थे उनके लिए सूरत में हीरे की पालिश करने वाले व्यवसाय में कार्य मिलना प्रारंभ हुआ। इससे स्थितियां थोड़ी सुधरीं लेकिन पिछले दो वर्षों में इस व्यवसाय में भी जबरदस्त मंदी आ गई। गुजरात मॉडल का महिमा मंडन कर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए और भाजपा अपने बूते पर लोकसभा में 282 स्थान भी ले आई। लेकिन यह फुगावा ही था। गुजरात में सन् 2009-10 तक (करीब 8 वर्षों तक) सरकारी विभागों में नगण्य भर्तियां हुईं। इसके बाद भर्ती का दौर शुरु किया गया। मजेदार बात यह है कि इसमें 5 वर्ष तक एक ही (फिक्स) वेतन जो 5 से 7 हजार रुपए तक होता है, का ही प्रावधान किया गया। लोगों का कहना है इसके लिए भी 5 से 10 लाख रुपए तक रिश्वत देना पड़ती थी। यानि गुजरात का विकास मॉडल केवल विकास का आभास ही देता है। यहां खेतों में पानी और बिजली तक नहीं है। लोग गुस्से में यहां तक कहते हैं कि राज्य का विकास यानि सिर्फ पांच उद्योगपतियों का विकास है। उनकी बात इसलिए भी गले उतरती है क्योंकि गुजरात अब मुख्यत: अमीरों का राज्य है और यहां मध्य एवं लघु उद्योग बहुतायत में थे जो अब नष्ट होते जा रहे हैं। बड़े कारखाने फिर वह चाहे अडानी, अम्बानी, टाटा, एस्सार किसी के भी हों बड़े स्तर पर रोजगार उपलब्ध नहीं कराते। सन् 1970 के दशक में जे.पी. के विद्यार्थी आंदोलन में, ''हम सब भारत माता के लाल हैं, आरक्षण का कहां सवाल हैÓÓ गुंजायमान करने वाले नवयुवक आज इसी के पीछे दौड़ रहे हैं। उच्च शिक्षा के निजीकरण के कारण गुजरात में शिक्षा अत्यंत महंगी हो गई है। आम आदमी का इसे पाना असंभव होता जा रहा है। एक ओर ग्रामीण शिक्षा का स्तर ऊँचा नहीं उठ पाया और दूसरी ओर ग्रामीण जीवनस्तर भी नीचा ही रहा। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण सभी मामलों में गुजरात औसत से नीचे ही है। इस सबके चलते शहरी पटेल जहां अमीर बना वहीं ग्रामीण पटेल गरीब होता चला गया। वाइब्रेंट गुजरात एक-दूसरे ही मायने में पाटीदार समाज को उद्वेलित कर गया। समावेशी विकास का सपना चूर-चूर हो गया और दूसरी ओर खेती अप्रासंगिक हो गई। आज नरेंद्र मोदी को लोग सपनों का ऐसा सौदागर बता रहे हैं जो अपने वायदे पूरे नहीं करता। इस हिंसक वारदातों में पटेल समुदाय के मंत्रियों पर सर्वाधिक गुस्सा दिखाना साफ दर्शा रहा है कि वह मानते हैं कि उन्हें धोखा दिया गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिस हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के बल पर देश पर शासन करना चाहता है, उसकी वह कमजोरी इस आंदोलन से उभरकर सामने आ गई है कि अगला ध्रुवीकरण धर्मों के भीतर भी हो सकता है। अहमदाबाद की क्रांति रैली ने भारत के विकास मॉडल पर पुन: विचार किए जाने का रास्ता खोला है। अत: इस मुद्दे को सिर्फ आरक्षण से जोडऩा भविष्य के लिए विध्वंसकारी सिद्ध हो सकता है। अभी-अभी एक और समाचार आया है कि धनगर समाज जिसने कि मध्यप्रदेश के मालवा आदि क्षेत्रों में राज किया है अब महाराष्ट्र में अपने लिए आरक्षण की मांग उठा रहा है।
Leave A comment
महत्वपूर्ण सूचना -
भारत सरकार की नई आईटी पॉलिसी के तहत किसी भी विषय/ व्यक्ति विशेष, समुदाय, धर्म तथा देश के विरुद्ध आपत्तिजनक टिप्पणी दंडनीय अपराध है। इस प्रकार की टिप्पणी पर कानूनी कार्रवाई (सजा या अर्थदंड अथवा दोनों) का प्रावधान है। अत: इस फोरम में भेजे गए किसी भी टिप्पणी की जिम्मेदारी पूर्णत: लेखक की होगी।