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विचारसरोकार Alert Star Digital Team Sep 1, 2015 11:52 AM

ओबीसी आरक्षण पर लगता ग्रहण

ओबीसी आरक्षण पर लगता ग्रहण

ओबीसी आरक्षण पर लगता ग्रहण

आज हम मंडल आयोग के अध्यक्ष बीपी मंडल 97वीं जयंती मना रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 15 तथा 16 में पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने का प्रावधान दिया गया था लेकिन प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग की विधिवत सिफारिश के अभाव में लागू नहीं किया जा सका। बाद में बीपी मण्डल की अध्यक्षता में द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन हुआ आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1980 को राष्ट्रपति को पेश की। लंबे राजनीतिक टालमटोल के बाद अंतत: 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिश को लागू कर दिया। मुझे अच्छी तरह याद है कि 7 अगस्त 1990 को जब मंडल आयोग लागू हुआ, पूरे देश में आरक्षण विरोधी लहर फैलाई गई। इसमें खास तौर पर स्कूल कॉलेज के बच्चों को टारगेट किया गया या कहें उन्हें भड़काया गया कि तुम्हारा हम छीना जा रहा है। लेकिन इनको ठीक-ठीक नहीं मालूम था कि ये क्योंकि है। लोग दलितों और आदिवासियों को इसके लिए जिम्मेदार मानकर हमले कर रहे थे। गौरतलब है कि हमलावरों में वे भी शामिल थे, जिनके हित के लिए मंडल आयोग की सिफारिशें लागू हुई थीं। जबकि ओबीसी समुदाय को खुशी मनानी थी क्योंकि उसे शिक्षा, समता, नौकरी के नये अवसर मिलने वाले थे वह अब अनुसूचित जाति 12 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति 16 प्रतिशत से भी ज्यादा 27 प्रतिशत आरक्षण का हकदार बन चुका था। दरअसल ओबीसी के आरक्षण की भूमिका संविधान निर्माताओं ने पहले ही बना दी थी जब डॉ. अंबेडकर ने अनुच्छेद 15(4) तथा 16(4) में इसका प्रावधान रखा था। जैसा कि सर्व विदित है ओबीसी आरक्षण को शुरु से विवादित बनाने का प्रयास एक खास रणनीति के तहत किया जाता रहा है ताकि ओबीसी आरक्षण खटाई में पड़ जाए। लेकिन ऐसा नहीं हो सका, ऐसा होता इसके पहले ओबीसी तब का अपने हित के प्रति जागरुक हो चुका था। मण्डल आयोग ने अन्य पिछड़ा वर्ग को पिछड़ा घोषित करने के तीन मुख्य मापदण्ड रखे थे जो क्रमश: इस प्रकार थे- 1. सामाजिक 2. शैक्षिक 3. आर्थिक। इस मापदण्ड में देश भर की राज्य वार जो जो जातियां आईं उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कर लिया गया। गौरतलब है कि इसमें अन्य पिछड़ा वर्ग की अन्य धर्मावलंबी जातियों जैसे मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, बौद्ध आदि को भी शामिल किया गया। दरअसल इस शिफारिश का उद्देश्य यह था कि सदियों से दबे, कुचले, वंचित समुदाय को समानता का हक मिल सके। धार्मिक जातिगत आरक्षण को क्षीण किया जा सके। जातिगत शोषणकारी नीतियों को लगाम लगाया जा सके। मंडल आयोग के पूर्व पिछड़ों की स्थिति: मण्डल आयोग के आने से पहले पिछड़े वर्ग के लोग अपने आपको सवर्ण मानकर खुश तो होते थे किंतु सामाजिक, शैक्षिक पिछड़ापन के शिकार होने के कारण हालात बदतर होती जा रही थी। क्योंकि आरक्षित वर्ग को नीची निगाह से देखा जाता था। उन्हें हर वक्त जलील करने की कोशिश की जाती थी। मंडल आयोग के आने के बाद पिछड़ा वर्ग की स्थिति: पिछड़े वर्ग को मण्डल आयोग की सिफारिशें समझने में देर लगी हों। भले ही उन्हें आरक्षण सहित अन्य सुविधाएं मिलना प्रारंभ हो गई हों। लेकिन मंडल आयोग के आने के बाद एक बड़ा बदलाव ये हुआ कि पिछड़ा वर्ग अपने पिछड़ेपन को स्वीकार करने लगा। सवर्ण होने का भ्रम टूटने लगा। उनमें सामाजिक चेतना का संचार हुआ। उन्हें ये समझने में काफी देर लगी कि देश का दलित और आदिवासी समाज सामाजिक चेतना के लिहाज से उनसे काफी आगे जा चुका था। जब कोई बीमार यह मानने लगता है कि उसमें फलां बीमारी है तो इलाज की दिशा सही होती है। आज देश में एक बड़ा पिछड़ा वर्ग आंदोलन खड़ा होने लगा। साहित्य इतिहास और सिद्धांत रचे जाने लगे जो सामाजिक चेतना को नई दिशा दे रहा है। पिछड़ा वर्ग आरक्षण में सेध लगाने की कोशिश: ऐसा देखा गया कि पिछड़ों को आरक्षण मिलने के बाद कई समृद्ध जातियों ने अपने आपको पिछड़ा घोषित करवाने हेतु आंदोलन शुरु कर देते हंै। वे जिस दबंगई से सरकार पर दबाव बनाती है उसे देखकर किसी भी दृष्टिकोण से पिछड़ी या दबी -कुचली जाति नहीं मानी जा सकती। हरियाणा में जाट समुदाय को पिछली सरकार ने ओबीसी में आरक्षण दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। इसी प्रकार गुजरात में पटेल समुदाय के द्वारा आरक्षण की मांग दमदारी से पेश की जा रही है। राजस्थान समेत अन्य प्रदेशों से ऐसी आवाजें आ रही हैं। पिछड़ा वर्ग में शामिल होने के क्या नियम है: देश में एक पिछड़ा वर्ग आयोग की स्थापना की गई है जिसका मुख्यालय दिल्ली में है। कोई भी समुदाय जो अपने आपको पिछड़ा मानता है विहित मापदण्डों को आधार बनाते हुए साक्ष्य के साथ आवेदन प्रस्तुत कर सकता है। आयोग इस आवेदन पर विधिवत् जांच एवं कार्रवाई के पश्चात ठीक समझे तो इस वर्ग में शामिल कर सकता है। यहां बताना अतिआवश्यक है कि अनुसूचित जाति जनजाति की तरह यह आरक्षण जातिगत नहीं, बल्कि वर्ग-गत है। यानि यदि कोई जाति सवर्ण ( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) नहीं है। इस आधार पर पिछड़ा वर्ग में शामिल होने का दावा नहीं कर सकती। उसे यह भी साबित करना होगा की वह सामाजिक शैक्षिक और आर्थिक आधार पर पिछड़ी हुई है। आइये जाने कि ऐसा करने के वास्तविक मकसद क्या हैं? 1. दबंग समुदाय यह चाहता है कि आरक्षण किसी प्रकार बंद किया जाय। बंद करने का आसान तरीका है कि उसके लिए मांग रखी जाय। जन धन का नुकसान किया जाय। ताकि सरकार का ध्यान उनकी तरफ हो सके। 2. धार्मिक रूप से नीची जाति के उत्थान से समानता की स्थिति निर्मित होती है। दबंग समुदाय यह बर्दाश्त करने के लिए मानसिक रूप से तैयार नही है। 3. ओबीसी में किसी दबंग जाति को शामिल करने का सीधा अर्थ है बेहद कमजोर जाति को अवसर से वंचित करना। ऐसा होने पर परिणाम क्योंकर होगा? 1. पिछड़ी जातियां और पिछड़ती जायेंगी। समानता के अवसर जो उसे संविधान से प्रदत्त हैं खोती जायेगी। 2. सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन के अनुसार 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं होनी चाहिए। इसका उल्लंघन होने की संभावना बढ़ जायेगी। जिससे ओबीसी आरक्षण कानूनी दांव-पेच में उलझ कर रह जायेगी। वैसे दबंग जातियों का आरक्षण की मांग दरअसल आरक्षण से इतर लक्ष्य पर केन्द्रित होता प्रतीत होता है। जैसे- 1. अपने समाज की राजनीति हैसियत को बढ़ाना 2. वास्तविक पिछड़ा समुदाय में खौफ का माहौल पैदा करना। 3. जातिगत हित के लिए सरकार से अवैध सौदेबादी के लिए माहौल तैयार करना 4 ऐसे दबंग समुदाय के सामाजिक नेताओं की राजनीतिक आकांक्षाओं का दुरुपयोग। दरअसल पूरे विश्व में वंचित समुदाय को आरक्षण देकर आगे बढ़ाना कोई नई बात नहीं है। विकसित देश इसी सहारे आज विकसित हो पाये हंै। हमारे देश की तरह विदेशों में भी राजतंत्र, सामंतीतंत्र और पादरी पुरोहिततंत्र का खात्मा करने के लिए तथा वंचित वर्ग के अधिकार हड़पने का सिलसिला खत्म करने के लिए आरक्षण जैसी सुविधाएं दी गई हैं। अमेरिका में इसे लिंडन जान्सवन के समय 'एफर्मेटिव एक्स नÓ के नाम से प्रक्रिया शुरु की गई। तब जाकर अमेरिका महाशक्ति बन सका। इसी प्रकार फ्रांस में डिप्रेस्ड क्लास के नाम से तो कनाडा और यूरोप में अलग-अलग नाम से यह आरक्षण व्यवस्था लागू की गई। लेकिन इसके पीछे वही सिद्धांत है जो हमारे यहां आरक्षण व्यवस्था के लिए है। कुछ देशों में 'तरजीही नियुक्तियांÓ नाम से तो कहीं 'रिवर्स डिस्क्रमनेशनÓ के नाम पर आरक्षण लागू कर देश को तरक्की पर लाने की कोशिश हो रही है। बात यहीं तक नहीं रुकती बड़ी-बड़ी मल्टी नेशनल कम्पनियां प्रतिवर्ष अपने कर्मचारियों का एक कम्युनल रिपोर्ट भी प्रकाशित करती हंै कि किस जाति या समुदाय का व्यक्ति कितनी संख्या में किस पद पर कार्यरत हंै। फेसबुक सहित कई कम्पनियां ऐसी रिपोर्ट पेश करती रही है ताकि भाई भतीजावाद, बैक डोर एन्ट्री पर रोक लगे तथा जिसकी जितनी संख्या, उसकी उतनी भागीदारी के सिद्धांत पर संतुलन बनाया जा सके। ये विदेशी कम्पनियां ऐसा करने में गर्वान्वित महसूस करती हंै। अब वक्त आ गया है हम जाति समुदाय से ऊपर उठकर देशहित में अपनी सोच को व्यापक बनाते हुए देश को विकसित बनाने में अपने अहम् किरदार अदा करे तभी भारत ऊंचाईयों में पहुंचेगा।

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