होम तेजस्वी यादव के लिए नेता प्रतिपक्ष की राह आसान नहीं, सामने होंगी ये 5 बड़ी चुनौतियां, पार पाना मुश्किल!
बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने विधायक दल के नेता का फैसला कर लिया है। आरजेडी ने यह जिम्मेदारी तेज प्रताप यादव को दी है। ऐसे में बिहार विधानसभा में तेज प्रताप यादव एक बार फिर नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में होंगे।
बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने विधायक दल के नेता का फैसला कर लिया है। आरजेडी ने यह जिम्मेदारी तेज प्रताप यादव को दी है। ऐसे में बिहार विधानसभा में तेज प्रताप यादव एक बार फिर नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में होंगे। सूत्रों का दावा है कि लालू प्रसाद यादव के निर्देश और विधायकों के मान-मनौव्वल के बाद तेज प्रताप यह जिम्मेदारी लेने को तैयार हुए।
हालांकि, 2020 के चुनाव के बाद जब तेज प्रताप नेता प्रतिपक्ष बने थे, तब उनके पास विधायकों की अच्छी संख्या (करीब 75) थी। लेकिन 14 नवंबर को संपन्न हुए चुनाव में 2020 के मुकाबले 50 सीट कम पाकर राजद महज 25 सीटों पर सिमट गई है। ऐसे में तेज प्रताप यादव के सामने बतौर नेता प्रतिपक्ष कई मुश्किलें होंगी।
इस बार पूरा महागठबंधन सिर्फ 35 सीटों पर सिमट गया है, जबकि एनडीए 200 से अधिक सीटों के साथ विधानसभा पहुंचा है। इतने कम संख्या बल के साथ सदन के अंदर सत्तारूढ़ गठबंधन (NDA) पर दबाव बनाना और विपक्ष का असर बनाए रखना तेज प्रताप यादव के लिए आसान नहीं होगा।
तेज प्रताप यादव के सामने दोहरी चुनौती होगी:
पार्टी के भीतर: उन्हें आरजेडी के महज 25 विधायकों को एकजुट रखना होगा।
सदन में: सदन में पूरे विपक्ष (महागठबंधन के घटक दलों) को एक साथ लाना भी उनके लिए आसान नहीं होगा।
चुनावी हार के बाद लालू परिवार में अंदरूनी कलह सामने आई है, जिसमें रोहिणी आचार्य द्वारा राजनीति छोड़ने और परिवार से नाता तोड़ने का ऐलान शामिल है। तेज प्रताप को न सिर्फ विधानसभा में पार्टी को एकजुट रखना होगा, बल्कि चुनाव से पहले तेज प्रताप के निष्कासन और परिणाम के बाद रोहिणी समेत अन्य बहनों के घर छोड़कर जाने के फैसले के बाद परिवार को भी एकजुट रखने का जिम्मा लगभग उन्हीं पर होगा।
तेजस्वी के जिन करीबी लोगों (संजय यादव, रमीज आदि) पर उनके परिवार और पार्टी के लोग गंभीर आरोप लगा रहे हैं, उन पर उन्हें या तो एक्शन लेना होगा या फिर कोई बीच का रास्ता निकालना होगा। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि न उनके करीबी उनसे दूर जाएं और न ही पार्टी-परिवार के बीच दूरियां बढ़ें। साथ ही, उन्हें अपने करीबियों पर पार्टी और परिवार के फैसलों में दखल देने की सीमाएं भी तय करनी होंगी।
AIMIM के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आरजेडी का मुख्य वोट बैंक 'MY' (मुस्लिम और यादव) का किला इस चुनाव में दरक गया है। ऐसे में उसे सहेजना तेज प्रताप की जिम्मेदारी है। इसके अलावा, 2025 के चुनाव में आरजेडी नेता ने युवाओं और महिलाओं से किए गए वादों पर जनता ने भरोसा नहीं किया। उन्हें अभी से आगामी चुनावों के लिए एक स्पष्ट और विश्वसनीय रणनीति बनानी होगी ताकि जनता उन पर एतबार कर सके।
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