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Alert Star Digital Team Oct 10, 2020 08:18 PM

टीआरपी की जंग ने कैसे किया टीवी न्यूज़ का सत्यानाश?

टीआरपी की जंग ने कैसे किया टीवी न्यूज़ का सत्यानाश?

टीआरपी की जंग ने कैसे किया टीवी न्यूज़ का सत्यानाश?

मुंबई पुलिस ने कुछ चैनलों द्वारा रेटिंग प्रणाली के साथ छेड़छाड़ करने टीआरपी बढ़ाने का भंडाफोड़ किया है. इस भंडाफोड़ ने टीआरपी यानी रेटिंग प्रणाली की खामियों को एक बार फिर से जगज़ाहिर कर दिया है.

ये अच्छी बात हो सकती है, लेकिन इस परदाफ़ाश ने टीआरपी की जंग का एक ही पहलू उजागर किया है. ये पहलू है रेटिंग सिस्टम में मौजूद खामियों का ग़लत तरीक़ों से फ़ायदा उठाना. मगर रेटिंग सिस्टम की केवल यही एक कमी नहीं है. कमियाँ और भी हैं मगर उन पर विचार करने से पहले इस बात पर सोचा जाना चाहिए कि टीआरपी बढ़ाने के लिए न्यूज़ चैनल इस तरह से पागल क्यों हैं कि वे ग़ैर कानूनी तरीके अपनाने तक को आमादा हैं?

मार्केट में अव्वल बनकर अपना वर्चस्व कायम करना और उसके बल पर मुनाफ़ा बढ़ाना एक लक्ष्य है. दूसरा मक़सद अग्रणी बनकर राजनीति और दूसरे हल्कों में अपनी पैठ बनाते हुए दूसरे लाभ उठाना. इसलिए टीआरपी की होड़ में अव्वल बने रहना ज़रूरी है. ध्यान रहे, टीआरपी गिरने से केवल विज्ञापन ही कम नहीं होते, बल्कि आपका रुतबा भी कम हो जाता है.

इसीलिए न्यूज़ चैनल टीआरपी की जंग में अपना सब कुछ झोंक देते हैं. वे हर हथकंडा आज़माने के लिए तैयार हो जाते हैं और इसका सबसे पहला प्रभाव पड़ता है न्यूज़ कंटेंट पर. इसलिए ये बहुत ज़रूरी है कि टीआरपी, टीवी न्यूज़ और बाज़ार के रिश्तों को समझा जाए.

बाज़ार की घुसपैठ

टेलीविज़न में जब तक बाज़ार ने घुसपैठ नहीं की थी तब तक कंटेंट में वे चीज़ें नहीं दिखाई देती थीं या बहुत कम दिखाई देती थीं, जिनकी शिकायत आज सब लोग करते हैं. उन पर एक संपादकीय नियंत्रण होता था और वह ध्यान रखता था कि कंटेंट स्तरीय हो और उसकी प्रस्तुति में भौंडापन कतई न आए. अस्सी और नब्वे के दशक का दूरदर्शन देख लीजिए. ये शालीनता आपको बराबर दिखेगी.

लेकिन विज्ञापनदाता आए तो अपने साथ टीआरपी भी लेकर आ गए. ये जानना उनकी ज़रूरत हो गई कि कौन से प्रोग्राम ज़्यादा देखे जा रहे हैं ताकि अपने विज्ञापन उन्हीं को दिए जाएं. उनका मक़सद ही यही था कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग उनके विज्ञापन देखें ताकि उनके उत्पादों की माँग बढ़े.

लिहाज़ा, 1986 में आईएमआरबी नामक मार्केटिंग एजंसी ने रेटिंग प्रणाली शुरू कर दी. उधर, दूरदर्शन ने भी 1998 में डार्ट का गठन करके अपने कार्यक्रमों की लोकप्रियता मापने का सिलसिला शुरू कर दिया. बस क्या था, लोकप्रिय कार्यक्रम ही सफलता की कसौटी बन गए. फिर लोकप्रियता के फॉर्मूले बनने लगे और उनके आधार पर कार्यक्रमों का निर्माण शुरू हो गया.

इसका सबसे पहले असर मनोरंजन के कार्यक्रमों पर पड़ा. उनकी दिशा बदल गई। वे साहित्यिक कृतियों से हटकर सोप ओपेरा की तरफ चले गए. इनमें वे तमाम मसाले आज़माए जाने लगे तो बॉक्स ऑफिस पर हिट रहने के लिए बंबईया फिल्मों में आज़माए जाते थे.

खाड़ी युद्ध का टेलीविज़न पर सीधा प्रसारण भारतीय टीवी इंडस्ट्री के लिए एक निर्णायक मोड़ था. सैटेलाइट के ज़रिए समाचारों के प्रसारण के लिए इसने वातावरण बना दिया. केबल के ज़रिए टेलीवज़न संपन्न लोगों के घरों में पहुँचने लगा. लोग सीएनएन और बीबीसी देखने लगे.

लेकिन टीवी न्यूज़ काफी समय तक बची रही. शायद इसलिए कि उसे बाज़ार के लिए उस तरह से खोला नहीं गया था. दूरदर्शन ने कुछ प्राइवेट प्रोड्यूसर को स्लॉट बेचे मगर कार्यक्रमों के लिए सख़्त दिशा-निर्देश भी रखे. इसीलिए शुरुआती दौर में न्यूज़लाइन, परख, आजतक (बीस मिनट की बुलेटिन) न्यूज़ टुनाइट, फर्स्ट एडिशन, फिलहाल जैसे न्यूज़ आधारित शो बनते रहे, जिनमें खरी पत्रकारिता देखी जा सकती थी.

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एलर्ट स्टार नाम की पत्रिका और फिर समाचार-पत्र का जन्म हुआ। हमारा प्रयास कि हम निष्पक्ष और निडर पत्रकारिता का वह स्वरूप अपने पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करे। जो लोगो के मन मस्तिष्क में एक भरोसे के रूप में काबिज हो।

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