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अयोध्या में राम मंदिर से आरएसएस को क्या मिला?
राम मंदिर आंदोलन से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को क्या हासिल हुआ?
ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब उस एक तस्वीर में मिलता है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भूमि पूजन करते दिख रहे हैं.
इस एक तस्वीर में जहां एक ओर पांडित्य कर्म करते आचार्य हैं, मध्य में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं और उनके बाएं हाथ पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत बैठे हैं.
भारत के इतिहास में संभवत: ये पहला मौक़ा होगा जब धर्म, सरकार और संघ के बीच क़रीबियां इतनी स्पष्ट रूप से उभरकर आईं हों.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दशकों लंबे इतिहास में ये शायद सबसे स्वर्णिम पल रहा हो.
सर संघचालक मोहन भागवत ने भी भूमि पूजन के बाद कहा, "आनंद का क्षण है, बहुत प्रकार से आनंद है. एक संकल्प लिया था. और मुझे स्मरण है कि तब के हमारे सरसंघचालक बाला साहेब देवरस जी ने ये बात क़दम आगे बढ़ाने से पहले याद दिलाई थी कि बहुत लगकर बीस-तीस साल काम करना पड़ेगा, तब कभी ये काम होगा. और बीस तीस साल हमने किया. और तीसवें साल के प्रारंभ में हमें संकल्प पूर्ति का आनंद मिल रहा है."
भागवत ने अपने नौ मिनट लंबे भाषण में जो कुछ कहा है, उसमें एक बात स्पष्ट है - संघ ने पाँच अगस्त, 2020 के दिन आयोजित हुए इस कार्यक्रम में राम मंदिर के निर्माण का पूरा श्रेय लेने की कोशिश की है.
सत्ता के बगल में पहुंचा संघ परिवार
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर किताब 'आरएसएस - द आइकंस ऑफ़ इंडियन राइट' लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार और लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय मानते हैं कि संघ इस आयोजन में जिस तरह शामिल हुआ है, उसके बाद संघ परिवार को सरकार के कार्यक्रम में एक वैधता मिल जाती है.
मुखोपाध्याय कहते हैं, "हिंदुस्तान में सत्ता और धर्म के बीच जो लकीरें हमेशा से रही हैं, वे हल्की सी धुंधली रही हैं. लेकिन इतनी ज़्यादा धुंधली कभी नहीं हुईं. संघ परिवार अब सरकार के कार्यक्रम में एक वैध हिस्सा हो जाता है. राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ को मैंने कभी भी सरकार के इतना क़रीब, आधिकारिक रूप से नहीं देखा है. ऐसे में ये हिंदुस्तान के राजनीतिक भविष्य के लिहाज़ से काफ़ी बड़े बदलाव हैं."
"प्रतीकों की बात करें तो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया गया है. मोहन भागवत की उपस्थिति से साफ़ हो गया कि संघ परिवार मंदिर आंदोलन की सफलता पर अपना हक़ जताने का दावा करता है."
लेकिन सवाल ये उठता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारतीय राजनीति में ये क़द कैसे हासिल किया?
राम के सहारे?
किसी समुदाय के धार्मिक, राजनीतिक, और सामुदायिक इतिहास का अध्ययन करने वाले अक्सर इस सवाल से जूझते हैं कि धार्मिक आंदोलन धार्मिक संस्थाओं को व्यापकता देते हैं या धार्मिक संस्थाओं की वजह से धार्मिक आंदोलन अस्तित्व में आते हैं.
अयोध्या और संघ के मामले में ये प्रश्न उभरकर सामने आता दिखता है कि राम मंदिर आंदोलन ने संघ को व्यापकता दी या संघ और उसके सहयोगी संगठनों की वजह से राम मंदिर आंदोलन खड़ा हो सका.
वरिष्ठ पत्रकार सुनीता एरॉन राम मंदिर निर्माण को आरएसएस की सबसे बड़ी सफलता मानती हैं.
वे कहती हैं, "राम मंदिर आंदोलन आरएसएस के कई मुद्दों में से एक थे. उन्होंने दलितों को साथ लेकर आने के लिए एक आंदोलन चलाया. दलित भोज कराए. अशोक सिंघल एक दलित भोज में शामिल हुए. ऐसे में मेरा ख्याल है कि आरएसएस के नेटवर्क ने इस आंदोलन की सफलता में एक भूमिका निभाई."
"इससे पहले आरएसएस ने गोवंश की हत्या का मुद्दा भी उठाया लेकिन राम मंदिर आंदोलन एक धार्मिक मुद्दा होने की वजह से बहुत बड़ी संख्या में लोग इस आंदोलन से जुड़े. क्योंकि राम की स्वीकार्यता काफ़ी व्यापक थी."
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