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श्रीराम की नजर में कभी कोई छोटा अथवा बड़ा नहीं रहा
श्रीराम की नजर में कभी कोई छोटा अथवा बड़ा नहीं रहा। वे वास्तव में समदर्शिता का सर्वोच्च मानक हैं...श्रीराम समता के मूल, सर्व अभयदाता हैं। माता शबरी के जूठे बेर चखे तो यह नहीं पूछा कि- हे माई अपनी जात तो बता दो। मां ने दिया तो पुत्र समान श्रीराम ने माथा नवाकर स्वीकार किया। श्रीराम केवट से मिलते हैं तो यह नहीं कहते कि मैं इक्ष्वाकु वंश में जन्मा, रघुकुल सूर्य क्षत्रिय शिरोमणि हूं।
वे मल्लाह केवटराज गुह को सिर झुकाकर प्रणाम करते हैं फिर कहते हैं भैया नदिया पार कराय दो। बहुत कृपा होगी। केवट के आंसू निकल जाते हैं। गद्गद, रोमांचित केवट करबद्ध प्रार्थना करता है कि हे प्रभु, उतराई देनी हो मुझे बैतरणी पार कराय देना। यह किसी क्षत्रिय और मल्लाह जाति के केवट के बीच का संवाद नहीं था। यह दो सज्जन महापुरुषों के मध्य भक्तिमय वार्तालाप था।
शिलावत अहल्या को पुन: प्राण दे समाज में प्रतिष्ठित करने का अर्थ क्या था? यह आज जाति के अंहकार में चूर वे लोग नहीं समझ सकते जो वास्तव में श्रीराम द्रोही, हिंदू द्रोही लोग हैं। सकल जगत में एक ही जाति है और वह जाति है सज्जनता की, रामभक्तों की। जो रामभक्त जाति-पांति के आधार पर विषमता बरतता है, वह न र्तो हिंदू है और न ही स्वयं को जानता है। अयोध्या में श्रीराम मंदिर के लिए किस कारसेवक ने अपना पहला बलिदान दिया, वह जाति से पहचाना जाएगा या अपनी रामभक्ति और राष्ट्रभक्ति से?
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