होम बिहार चुनाव 2025: तालाब में उतरे राहुल गांधी, क्या ‘राजनीतिक छलांग’ से महागठबंधन की नैया लगेगी पार? 40-50 सीटों पर असर की उम्मीद
बिहार की सियासत में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की हालिया सक्रियता ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। बेगूसराय में तालाब में उतरकर मछुआरा समुदाय के साथ मछली पकड़ने का उनका अंदाज़ केवल प्रतीकात्मक कदम नहीं बल्कि एक राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
पटना: बिहार की सियासत में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की हालिया सक्रियता ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। बेगूसराय में तालाब में उतरकर मछुआरा समुदाय के साथ मछली पकड़ने का उनका अंदाज़ केवल प्रतीकात्मक कदम नहीं बल्कि एक राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। राहुल गांधी की यह पहल सीधे तौर पर निषाद और मल्लाह समुदाय को साधने की कोशिश मानी जा रही है, जो राज्य के कई इलाकों में प्रभावशाली मतदाता समूह है।
राहुल गांधी ने रविवार (2 नवंबर) को बेगूसराय में मतदाता अधिकार यात्रा के दौरान तालाब में उतरकर मछुआरों से मुलाकात की। उनके साथ वीआईपी पार्टी के प्रमुख मुकेश सहनी भी मौजूद थे, जिन्हें ‘सन ऑफ मल्लाह’ कहा जाता है।
राहुल गांधी ने ‘एक्स’ पर लिखा,
“बेगूसराय, बिहार में आज VIP पार्टी के अध्यक्ष मुकेश सहनी जी के साथ वहां के मछुआरा समुदाय से मिलकर बहुत अच्छा लगा। काम उनका जितना दिलचस्प है, उससे जुड़ी उनकी समस्याएं और संघर्ष उतने ही गंभीर हैं। मगर हर परिस्थिति में उनकी मेहनत, जज़्बा और व्यवसाय की गहरी समझ प्रेरणादायक है।”
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राहुल गांधी का यह कदम कांग्रेस के लिए एक नए जनसंपर्क अभियान की तरह है। लंबे समय से राजनीतिक हाशिये पर रहे निषाद समुदाय को सम्मान और प्रतिनिधित्व का संदेश देना इस पहल का मुख्य उद्देश्य माना जा रहा है।
हालांकि, बीजेपी ने इसे ‘चुनावी ड्रामा’ बताया है। पार्टी नेताओं ने कहा कि राहुल गांधी ने कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के छठ पर्व पर घाट पर जाने को ‘ड्रामा’ कहा था, और अब वही खुद कर रहे हैं।
कांग्रेस का मानना है कि यदि राहुल गांधी का यह जुड़ाव वोटों में बदलता है, तो बिहार की 40 से 50 विधानसभा सीटों पर इसका सीधा असर देखा जा सकता है। मुकेश सहनी की पार्टी पहले एनडीए का हिस्सा थी, लेकिन अब महागठबंधन के साथ है। इस साझेदारी से कांग्रेस को उम्मीद है कि निषाद और मल्लाह मतदाता महागठबंधन के पक्ष में एकजुट होंगे।
राजनीतिक समीक्षकों के अनुसार, बेगूसराय, मुजफ्फरपुर, खगड़िया, सहरसा और दरभंगा जैसे जिलों में निषाद समुदाय की निर्णायक भूमिका है। यदि यह समुदाय कांग्रेस या महागठबंधन की ओर झुकता है, तो चुनावी नतीजों में बड़ा बदलाव संभव है।
हालांकि विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यदि मतदाता इसे सिर्फ एक चुनावी प्रदर्शन या प्रतीकात्मक कदम मानते हैं, तो यह दांव उल्टा भी पड़ सकता है। बिहार की जनता अब प्रतीकवाद से आगे बढ़कर ठोस विकास और रोजगार की उम्मीद रखती है।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या राहुल गांधी की यह ‘राजनीतिक छलांग’ वाकई महागठबंधन की नैया को पार लगाती है या फिर यह सिर्फ एक चुनावी तस्वीर बनकर रह जाती है।
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